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गीत-ऐ! राही आगे बढ़ता जा

ऐ! राही! आगे बढ़ता जा।

पथिक सत्य के पथ का तूँ है
उच्च-शिखर पर चढ़ता जा।
ऐ! राही! पथ पर.......

संघर्षों से तूँ ना डरना।
पथ पर पग पीछे ना धरना।।
बहुत मिलेंगे क्षणिक बवंडर।
रोकेंगे तुझको पग-पग पर।।
तोड़ आँधियों का मद प्यारे!
बाधाओं से लड़ता जा।
ऐ! राही! पथ पर.......

यूँ प्रतिमान रचे ना कोई।
कठिनाई से बचे न कोई।।
करके फिर अवलोकन देखो।
युग-पुरुषों का जीवन देखो।।
पाठ सत्य-संघर्ष-विजय का,
तव-जीवन के पढ़ता जा।
ऐ! राही! पथ पर.......

कष्ट-साध्य-दुर्गम पथ प्यारे!
सच्चे साधक कब हैं हारे?
लक्ष्य सहज यूँ कहाँ मिलेगा?
सत्य-परीक्षा प्रतिक्षण लेगा।
धैर्य-शौर्य-साहस के अपने,
अमिट कहानी गढ़ता जा।
ऐ! राही! पथ पर..........

विजय-पराजय बहुत मिलेंगे।
ये तो लघु मोती-से होंगे।।
लक्ष्य कीमती कोहिनूर है।
शिखर-बिंदु अब नही दूर है।
संघर्षों में जय के मोती,
शीशमुकुट निज जड़ता जा।
ऐ राही पथ पर........
पथिक सत्य के.........
ऐ! राही! पथ पर.......

रचनाकार-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by रामबली गुप्ता on July 7, 2016 at 2:15pm
गीत की सराहना के लिए हृदय से आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 5, 2016 at 10:17pm

आदरणीय रामबली गुप्ता जी सादर, मेरा इशारा स्थायी की तरफ था. जिसे आदरणीय डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव साहब ने और स्पष्ट किया है. सादर.

Comment by रामबली गुप्ता on July 5, 2016 at 9:55pm
आद0 गोपाल नारायण जी सराहना एवं सुझावों के लिए हृदय से आभार। आपके सुझावों के अनुरूप अलग से संशोधन कर चुका हूँ।
Comment by रामबली गुप्ता on July 5, 2016 at 9:50pm
आद0 अशोक जी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार किन्तु प्रथम पंक्ति और अंतरे में किस अंतर की ओर इंगित करना चाहते है आप मैं समझ न सका। कृपया स्पष्ट करें ताकि मार्गदर्शन मिल सके।सादर
Comment by रामबली गुप्ता on July 5, 2016 at 9:46pm
हृदय से आभार आद0 रवि शुक्ल जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2016 at 8:45pm

आदरणीय राम बली भाई , जीने का जोश भरते आपके गीत के लिये हार्दिक बधाई । बाक़ी शिल्प पर आ. गोपाल जी ने कह ही दिया है ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 5, 2016 at 9:51am

aअ० राम बली जी , सुन्दर् रचना  -------------------------------

यदि प्रारम्भ हैं -ऐ! राही! आगे बढ़ता जा।------ तो ---ऐ! राही! पथ पर.......कैसे ?

संघर्षों से तूँ ना डरना।
पथ पर पग पीछे ना धरना।।-------- 'ना'  शब्द के प्रयोग से बचें  'न'' सही है . आवश्यकता पड़ने पर 'ना '' को 'मत' किया जा सकता है .

पथिक सत्य के पथ का तूँ है
संघर्षों से तूँ ना डरना।------------------------तूँ  नहीं तू सही होगा .  शुभ-शुभ  आदरणीय . .

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 4, 2016 at 11:59pm

आदरणीय रामबली गुप्ता जी सादर, सुंदर गीत रचा है किन्तु प्रथम पंक्ति कुछ और है जबकि आपने हर अंतरे के पश्चात कुछ और ली है. अंतिम अंतरे की यह पंक्ति भी एक बार जांच लें "विजय पराजय बहुत मिलेंगे" ......मिलेंगे या मिलेंगी देख लें. सादर.

Comment by Ravi Shukla on July 4, 2016 at 1:06pm

आदरणीय राम बली जी सुन्‍दर और प्रेरक गीत के लिये हार्दिक बधाई स्‍वीकार करें । 

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