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बस मैं जानूं या तुम जानो ......

बस मैं जानूं या तुम जानो ......


पीर पीर   को    क्या    जाने
नैन   विरह   से      अनजाने
वो दृग स्पर्श की अकथ कथा
बस   मैं   जानूं या तुम जानो ....... 


पल बीता  कुछ  उदास  हुआ
रुष्ट श्वास से  मधुमास   हुआ
क्यूँ दृगजल से घन बरस पड़े
बस  मैं  जानूं  या  तुम जानो ....... .

तुम   हर   पल   मेरे साथ थे
मेरी   श्वास   के  विशवास थे
क्यूँ   शेष   बीच  अवसाद रहे
बस  मैं   जानूं  या तुम जानो ......

सपन   नयन  से  झरने लगे
स्पंदन  देह  को   डसने  लगे
स्मृति  हंस  क्यों   मौन  हुए
बस  मैं  जानूं  या तुम जानो .....

कुछ  पास  हुए  कुछ दूर हुए
उर  भाव  अकथ मजबूर हुए
क्यों  सृजन  पूर्व सँहार हुआ
बस मैं  जानूं  या  तुम जानो .......

आसक्ति  पुष्प  सब धूल हुए 

पल  बाहुपाश  के   शूल  हुए
ये प्रेम विहग क्यूँ  मौन  हुए
बस  मैं   जानूं या तुम जानो .......

देह  अदेह   का   भेद  मिटा
शलभ   दीप   का नेह मिटा
क्यूँ  प्रेम  पंथ वट हीन हुआ
बस  मैं   जानूं या तुम जानो ......

बीती   विभावरी   की    बातें
सस्मित   सपनों   की    रातें
क्यूँ   बिम्ब  सभी अनंत  हुए
बस   मैं   जानूं या तुम जानो ...


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 720

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Comment by Sushil Sarna on April 3, 2016 at 3:33pm

आ.   vijay nikore  जी प्रस्तुति में निहित भावों को मान देने का हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on April 3, 2016 at 3:26pm

बहुत ही सुन्दर भाव । रचना अच्छी लगी। बधाई।

Comment by Sushil Sarna on April 2, 2016 at 1:33pm

आ.  Dr Ashutosh Mishra जी प्रस्तुति में निहित भावों को मान देने का हार्दिक आभार।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 1, 2016 at 10:22pm
आदरणीय सुशील जी रचना पर मेरी हार्दिक शुभकामनाये स्वीकार करें स्साद्रर
Comment by Sushil Sarna on April 1, 2016 at 7:52pm

आ.   सुनील प्रसाद(शाहाबादी)  जी प्रस्तुति को आपके प्रशंसनीय शब्दों ने जो मान दिया है उसके लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 1, 2016 at 7:22pm
बहुत सुन्दर गीत हुई है आदरणीय भावनाओं को छूते कोमल शब्दों का प्रयोग मन मोहतें हैं।
Comment by Sushil Sarna on April 1, 2016 at 4:05pm

आदरणीय समर कबीर साहिब आदाब  .... आपने हमेशा मेरे सृजन को थपथपाया है  ... इस होसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Samar kabeer on April 1, 2016 at 2:56pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,सुंदर भवों से सजी इस शानदार प्रस्तुति के लिये बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on April 1, 2016 at 1:45pm

आ.  maharshi tripathi  जी प्रस्तुति को आपके प्रशंसनीय शब्दों ने जो मान दिया है उसके लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on April 1, 2016 at 1:45pm

आ. narendrasinh chauhan जी प्रस्तुति में निहित भावों को मान देने का हार्दिक आभार।

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