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लग्न-मुहूर्त(लघुकथा)-सतविंदर कुमार

"अरे!जानती हो आचार्य जगत ज्ञानी जी की पुत्रवधु मरते-मरते बची। बस भगवान ने साँसे बख्श दी। वर्ना ऐसा दुःख मिला है जीवन भर कलेजे में ठुंसा रहेगा।बेचारी!"
बैठने के लिए पीढ़ा सरकाते हुए मुख्तारी ताई एक साँस में बोल गई।
"हाँ! सुना तो है कि कल उसकी तबियत ज्यादा ख़राब हो गई थी। शहर के नर्सिंग होम में ही दाखिल है। अभी तक..."
कुछ सोचते हुए फिर बोली, "अब तो उसकी तबीयत में काफी सुधार है।फिर आप किस दुःख की बात कर रही हो ताई?"
सहमते हुए।
"अरे! जानती हो न कि उसका प्रसव का समय नजदीक ही था।"
"हाँ ये तो जानती हूँ कि........था!"
बोलते-बोलते चोंकी।
"मतलब क्या हुआ ताई?"
ताई गाल को हाथ का सहारा देते हुए, "कल ही प्रसव पीड़ा का अंदेशा हुआ। लड़का घर पे था नहीं। आचार्य जी थे। जैसे ही अंदेशा हुआ सास ने आचार्य जी को बोला कि या तो पड़ोस वाली नर्स को बुला लें या बहु को लेकर हस्पताल ले जाने की तैयारी करें।"
"फिर?"
"फिर क्या ज्योतिषाचार्य जो ठहरे। पहले तो बैठ गए पोथी खोल कर। काफी समय गणना करने के बाद बोले कि पूरे एक घण्टे बाद शुभ लग्न शुरू होगा। यदि उससे पहले बच्चे का जन्म होता है तो यह माता-पिता व दादा-दादी पर बहुत भारी रहेगा।"
"बहू की हालत तो...
चिंता में बस इतना ही बोल पाई।
"देरी से बहू को अस्पताल ले जाया गया और तब तक हालत इतनी बिगड़ गई थी कि डॉ बड़ी मुश्किल से बस बहू को ही बचा पाए।"
"हैंsss..?"

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on July 19, 2016 at 11:13pm
सादर आभार आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डेय जी।सादर नमन
Comment by Shubhranshu Pandey on April 24, 2016 at 8:48pm

आदरणीय सतविन्द्र जी, 

सुन्दर भाव के साथ कथा कही गयी है. सादर.

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 14, 2016 at 9:19pm
रचना पर आपकी उपस्थिति से प्रोत्साहन मिला।इस स्नेह के लिए हार्दिक आभार आदरणीया नीता कसार जी।
Comment by Nita Kasar on April 14, 2016 at 4:18pm
लग्न,मुहूर्त के फेर में बच्चे को गवाँ बैठे,लोग जिंदगी से नासमझी में खेलते है।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 12, 2016 at 9:17pm
आपके अनुमोदन एवम् स्नेहिल प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 11, 2016 at 8:35pm
बहुत सुंदर सतविंदर जी

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