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कन्या दान के बाद से बिदाई तक लगातार रोती रही । रोते रोते सोफे पर बेसुध सी पडी़ रही।सभी बिदाई में व्यस्त जो थे।

दादा जी ने गोदी में उठाया,"उठ बिट्टो खाना खा ले, बुआ तो गई।"
तुनक कर गुस्से से बोली "नहीं कुछ नहीं खाउंगी आपने मेरी कल्लो बुआ और लाली बछिया दोनों को दान में दे दिया।बुआ को दूल्हा अपने साथ ले गया।"
"बुआ की शादी हुई है बिट्टो,बे तुम्हारे फूफा जी है।"
"कोई फूफा जी नहीं, मैं और बुआ दोनों रोते रहे फिर भी बुआ को साथ ले गए।"
"अगले हफ्ते ले आयेगे बुआ को।"
"अब नहीं आने बाली बुआ ,दान में जो दे दी आपने।"
"नहीं बिट्टो,ऐसा नहीं कहते।"
"हां, पंडित जी कह रहे थे ,दान की बछिया के दांत नहीं देखते,बंधी रहेगी कोने में एक खूंटे से।"
" तो क्या दादू ,आप मुझे भी दान में दे दोगे?"
मुझे नहीं बंधना खूंटे से ।

पवन जैन ,जबलपुर ।
(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by Shubhranshu Pandey on April 23, 2016 at 8:35pm

आदरणीय पवन जैन जी, नचिकेता का अपने पिता से प्रश्न और बोट्टो का अपने दादा जी से प्रश्न, "आप मुझे भी दान में दे दोगे?" दोनो में प्रश्न की समानता है. इस प्रश्न के उत्तर में कई गुत्थियाँ उलझती और सुलझती जायेंगी.

सादर.

 

Comment by Pawan Jain on April 23, 2016 at 8:35am

आभार आदरणीय नीता कसार जी ।

Comment by Nita Kasar on April 20, 2016 at 2:23pm
परंपराओं की बेड़ियाँ भी कैसी कैसी कन्या दान करते है पर वर दान क्यों नही ।सारगर्भित संदेशा देती कथा है बधाई आपके आद०पवन जैन जी ।
Comment by Pawan Jain on April 20, 2016 at 2:03pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सुरेंद्र कुमार शुक्ला जी ।

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 19, 2016 at 5:28pm

दान की बछिया के दांत नहीं देखते,बंधी रहेगी कोने में एक खूंटे से....

सुन्दर लघु कथा ...बहुत कुछ कह गयी ये ..अब बदलाव हो रहा है और हो...
भ्रमर ५

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