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ग़ज़ल ( आसरा ढूंढने किधर जाए )

2122--1212--22

उनकी नज़रों से जो उतर जाए |

आसरा ढूंढ़ने  किधर  जाए |

कर लिया है यक़ीन उनपे मगर

डर  है यह भी न वो मुकर जाए |

जो ज़ुबां कर न  पाए उल्फ़त में

आँख चुप चाप उसको कर जाए |

भीड़ आए नज़र क़ियामत सी

शोख़ उनकी नज़र जिधर जाए |

मिल गया जब खिताबे दीवाना

उनके कूचे से कौन घर जाए |

जिसके घर का पता नहीं कोई

कैसे उस तक कोई ख़बर जाए |

दिन में तस्दीक़ आए रात नज़र

ज़ुल्फ़ उनकी अगर बिखर जाए |

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 25, 2016 at 10:03pm

 
मोहतरमा राजेश  कुमारी साहिबा   , ग़ज़ल में इतनी गहराई से शिरकत करने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत , शुक्रिया ,महरबानी । ग़ज़ल को वक़्त कम दे सका उस वजह से वादा शब्द नहीं ला सका । आपने सही लिखा है, मैंने यूँ तब्दील किया है । उसके वादे पे तो किया है यक़ीं ------डर मगर  है न वो मुकर जाए। --------शुक्रिया                               

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 25, 2016 at 9:51pm

मोहतरम जनाब गिरिराज ,साहिब  , ग़ज़ल में इतनी गहराई से शिरकत करने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत , शुक्रिया ,महरबानी

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 25, 2016 at 9:51pm

मोहतरम जनाब रवि शुक्ल ,साहिब  , ग़ज़ल में इतनी गहराई से शिरकत करने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत , शुक्रिया ,महरबानी

Comment by Samar kabeer on April 25, 2016 at 9:28pm
"उसके वादे पे कर लिया है यकीं
डर यही है न वो मुकर जाए "

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 25, 2016 at 8:59pm

जो ज़ुबां कर न  पाए उल्फ़त में

आँख चुप चाप उसको कर जाए |---वाह्ह्ह्ह 

सुन्दर ग़ज़ल कही है आ० तस्दीक जी बस दुसरे शेर में बात स्पष्ट नहीं है 

उनके वादों पे कर लिया तो यकीं 

डर मगर है  न वो मुकर जाए ---अब देखिये शायद बात बनी 

इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए दिल से दाद कुबूलें 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 25, 2016 at 6:31pm

आदरणीय तस्दीक भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही आपने , दिली बधाइयाँ आपको ।

Comment by Ravi Shukla on April 25, 2016 at 2:02pm

आदरणीय तसदीक अहमद जी आपकी गजल पढ़ी तरही मुशायरे 70 केे काफिये और रदीफ पर इस छोटी बह्र में भी आप अच्‍छे ,खयाल लेकर आये है

जो ज़ुबां कर न  पाए उल्फ़त में

आँख चुप चाप उसको कर जाए | बहुत खूब 

मोवाईल से कल दाद ओ मुबारक  केे लिये कोश्‍ािश की थी पर हैंंग हो गया तो आज स्‍वीकार करें । सादर । 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 24, 2016 at 7:18pm

मोहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत करने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया , महरबानी
दूसरे शेर में लफ्ज़ वादा नहीं  आ पाया  है। .......आप बिलकुल सही कह रहे हैं ,शुक्रिया

Comment by Samar kabeer on April 24, 2016 at 6:06pm
जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,'मजरूह'की ज़मीन में अच्छे शैर निकाले हैं आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
दूसरे शैर में बात साफ़ नहीं हो पाई है देखिएगा ।

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