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ग़ज़ल(उल्फत का रंग है )

ग़ज़ल (उल्फत का रंग है )

------------------------------------

221 --2121 --1221 ---212

ऐसा लगे है चढ़ गया उल्फत का रंग है ।

जो कल मेरे ख़िलाफ़ था वह  आज संग है ।

वह मेरे पास बैठ गए सब को छोड़ के

यूँ हर कोई न देख के महफ़िल में दंग  है ।

तरके वफ़ा का मश्वरा मत दीजिये हमें

सब जानते हैं आपका ये सिर्फ ढंग है ।

जिस दिन से जायदाद गए बाप छोड़ कर

घर तब से बन गया मेरा मैदाने जंग है ।

मैं एक क़दम बढ़ा तो बढ़ा वह कई क़दम

मेरा हबीब देख लो कितना दबंग है ।

नज़रें अभी न फेर सहारा तो ढूंड लूँ

बिन डोर अर्श पर कहाँ उड़ती पतंग है ।

तस्दीक़ होशियार रहो ऐसे शख़्स से

लब  पर वफ़ा निगाह मगर जिसकी तंग है ।

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 3, 2016 at 8:40pm

मोहतरम जनाब मिथिलेश वामनकर  साहिब ,  ग़ज़ल में शिरकत करने और हौसला अफ़ज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ,महरबानी

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 3, 2016 at 8:38pm

मोहतरम जनाब नादिर खान साहिब आदाब , मेरे ख़याल से कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए दोनों मिसरे  अपनी जगह सही हैं । लेकिन आपके मश्वरे से भी लफ़्ज़ों को इधर उधर करने कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा ।

हर शख़्स अंजुमन में नहीं यूँ ही दंग है । ........ बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by नादिर ख़ान on May 3, 2016 at 5:05pm

"नागाह हो गए वो मुख़ातिब मेरी तरफ

यूँ ही न अंजुमन में हर इक शख़्स दंग है" 

जनाब तस्दीक साहब
"यूँ ही न" की जगह "यूँ ही नहीं" लिया जा सकता है लेकिन फिर आपको आगे के शब्द बदलने पड़ेंगे
तथा दोनों मिसरों में समन्जस्व स्थापित होना ज़रूरी है, ऐसा मैंने सुधीजनों से सुना है। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 3, 2016 at 4:25pm

आदरणीय तस्दीक जी, इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 2, 2016 at 9:52pm

मोहतरम जनाब तेजवीर  साहिब , ग़ज़ल में शिरकत करने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी। .

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 2, 2016 at 9:51pm

मोहतरम जनाब सौरभ  साहिब , ग़ज़ल में शिरकत करने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी। .... समर साहिब के मश्वरे के मुताबिक गौर कर लिया है ,  सिर्फ शेर 2 पर मैं मुतमइन नहीं हो पारहा था उसे तब्दील कर लिया है। ....... शुक्रिया

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 2, 2016 at 9:46pm

जनाब जयनित कुमार साहिब , ग़ज़ल में शिरकत करने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 2, 2016 at 9:44pm

मोहतरम जनाब नादिर खान साहिब आदाब , समर साहिब का कीमती मश्वरा सर आँखों पर ,  दर अस्ल मैं दूसरे शेर से मुतमइन नहीं हो पारहा  था जो  ख्याल दिमाग में था वो नहीं आ पाया। ..... उसे कुछ इस तरह किया है ------

नागाह हो गए वो मुख़ातिब मेरी तरफ

यूँ ही न अंजुमन में हर इक शख़्स दंग है ।

शुक्रिया


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 2, 2016 at 8:17pm

अनुज जयनित भाई, 

मेरा इशारा आप समझ गये, मैं तहे दिल से शुक़्रग़ुज़ार हूँ. मैं जो आपको समझाना चाह रहा था, वह आप समझ चुके हैं. धन्यवाद.

शुभ-शुभ

Comment by TEJ VEER SINGH on May 2, 2016 at 8:06pm

हार्दिक बधाई आदरणीय तस्दीक अहमद खान साहब जी!सुंदर गज़ल!

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