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एक ग़ज़ल ओबीओ के नाम

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन/फ़ेलान

ज पर तुझको देखना है मुझे
त्र में उसने ये लिखा है मुझे

स्ल-ए-नव से मदद का तालिब हूँ
बुर्ज नफ़रत का तोड़ना है मुझे

क्या कहूँ ,कब मिलेगा मीठा फल   
ब्र करना तो आ गया है मुझे

ज तेरे बग़ैर ये जीवन
र्क जैसा ही लग रहा है मुझे

लाख दुश्वारियाँ हों, जाऊँगा
श्क़ तेरा बुला रहा है मुझे

र्म गुफ़्तार से "समर" देखो
आज फिर ज़ैर कर लिया है मुझे

_________

ओज :- ऊँचाई
नस्ल-ए-नव :- नई नस्ल
बुर्ज :- गुम्बद
गुफ़्तार :- बोलचाल

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on June 14, 2016 at 11:05am
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 14, 2016 at 11:00am
जनाब डॉ.आशुतोष मिश्रा जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 13, 2016 at 11:44pm
वाह वाह जनाब समर सहाब बेहतरीन गज़ल । मुबारकबाद कुबूल करें ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 13, 2016 at 3:12pm

आदरणीय समर सर ..इस उत्कृष्ट रचना के लिए तहे दिल बधाई स्वीकार करें सादर प्रणाम के साथ 

Comment by Samar kabeer on May 26, 2016 at 12:06pm
मोहतरमा राहिला जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Rahila on May 22, 2016 at 1:30pm
वाह. .आदरणीय सर जी! खूब शानदार गज़ल हुई ।सादर बधाई ।
Comment by Samar kabeer on May 19, 2016 at 2:19pm
जनाब पवन कुमार जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Pawan Kumar on May 19, 2016 at 12:58pm

वाह क्या बात, क्या बात, क्या बात बहुत खूब
आदरणीय, ओबीओ समर्पित रचना की सुन्दरता के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on May 8, 2016 at 11:34pm
जनाब डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आदाब ,बहुत बहुत शुक्रिया जनाब ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 5, 2016 at 4:19pm

बहुत उम्दा आदरणीय .

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