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ग़ज़ल -- मेरे आँगन का बूढ़ा शजर.... ( दिनेश कुमार )

212--212--212----212--212--212

अब्र का एक टुकड़ा है वो ......और मैं हूँ बशर धूप का
दिल के सहरा में खोजूं उसे, मैं क़फ़न बाँध कर धूप का

ज़िन्दगी की लिए जुस्तजू ..एक मुद्दत से बेघर हूँ मैं,
गाम दर गाम तन्हाइयाँ....हम-सफ़र है शजर धूप का

बर्फ़ बेशक जमी है बहुत, ख़त्म लेकिन मरासिम नहीं
मैं करुँगा जो करना पड़े... इन्तिज़ार उम्र भर धूप का

नाख़ुदा है मिरा हौसला, और पतवार........ बाज़ू मिरे
अपने साहिल पे पहुँचूँगा मैं, पार करके भँवर धूप का

इसका साया बचाता मुझे, हर तमाज़त से हर एक बार
मेरे आँगन का बूढ़ा शजर, सोखता है असर धूप का

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by दिनेश कुमार on May 6, 2016 at 7:01pm
आदरणीय साथियों का हार्दिक अअभार। हौसला अफ़ज़ाई के लिय
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 6, 2016 at 5:48pm
दिनेश जी , बहुत बढ़िया गजल हुई है .बधाई
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 6, 2016 at 5:48pm
दिनेश जी , बहुत बढ़िया गजल हुई है .बधाई
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2016 at 7:14am

बहुत खूब आ. दिनेश जी ..बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2016 at 12:27am

आदरणीय दिनेश भाई जी, अच्छी ग़ज़ल है हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by दिनेश कुमार on May 5, 2016 at 5:00pm
शुक्रिया आदरणीय समर सर जी।
Comment by दिनेश कुमार on May 5, 2016 at 4:59pm
शुक्रिया आदरणीय सरना सर जी।
Comment by Samar kabeer on May 5, 2016 at 2:59pm
जनाब दिनेश कुमार साहिब आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on May 5, 2016 at 1:34pm

ब्र का एक टुकड़ा है वो ......और मैं हूँ बशर धूप का

दिल के सहरा में खोजूं उसे, मैं क़फ़न बाँध कर धूप का

ज़िन्दगी की लिए जुस्तजू ..एक मुद्दत से बेघर हूँ मैं,

गाम दर गाम तन्हाइयाँ....हम-सफ़र है शजर धूप का

उफ़ कितने गहन भावों के अशआर अपने ग़ज़ल में उतारे हैं आदरणीय। दिल कायल को गया आपकी कलम का। दिल से बधाई स्वीकार करें आदरणीय सर।

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