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बह्र नई सी आप तो कोई, उम्दा ग़ज़ल ही लगती हैं- ग़ज़ल

2222 2222 2222 222
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आपकी नज़रें ताज़ा ताज़ा, फूल कमल ही लगती हैं।
बह्र नयी सी आप तो कोई, उम्दा ग़ज़ल ही लगती हैं।।

चाह रहे हैं छू लें लेकिन, रुसवाई से हम डर जाते।
जबकी मुस्का कर मिलती हैं, आप सरल ही लगती हैं।।

इसकी प्यास कई सदियों की, है मन का पंछी व्याकुल।
आप स्रोत सब मदिराओं की, असली तरल ही लगती हैं।।

जितने रूप धरा के सुन्दर, सारे हैं फीके फीके।
आपकी फ़ोटो कॉपी सारे, आप असल ही लगती हैं।।

चाँदनी में जब भी मिलता हूँ, प्यास नज़र की बढ़ जाती।
रूप धवल मनमोहक बिल्कुल, ताज़महल ही लगती हैं।।

मौलिक-अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 5, 2016 at 12:36pm
आदरणीय सौरभ सर सादर प्रणाम। आपके सुझावों के अनुरूप संशोधन करने की कोशिश करता हूँ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 3, 2016 at 8:31pm

इससे पहले कि इस ग़ज़ल पर कुछ कहूँ, निवेदन है कि आप मिसरों के वज़न को पन्द्रह गुरु के हिसाब से कर लें. ऐसी मात्रिक बहरों में लगातार दो लघुओं का कोई अर्थ नहीं होता. ये मात्रिक बहरें हैं जो कि फेलुन-फेलुन.. फ़ा के अनुसार निबद्ध होती हैं. यहाँ फेलुन की संख्या शाइर के अनुसार हुआ करती है, जिसमें दो गुरु होते हैं. यही कारण है कि आपकी इस ग़ज़ल के मिसरे का वज़न पन्द्रह गुरु का निवेदन कर रहा हूँ.

दूसरे, बहर कोई हो, उसमें अपने हिसाब से जोड़-तोड़ करने से बचना चाहिए. शुरुआती दौर में तो और भी इसे निषेध माना जाना चाहिए. बहर का निर्धारण आला दर्ज़े के उस्तादों का काम है, न कि हमारे-आपके जैसे अभ्यासियों का.

अब आपकी इस ग़ज़ल पर -

 इस तरह की मात्रिक बहर की खुसूसियत इसकी गेयता या इसके मिसरों का प्रवाह हुआ करता है. वाचन में प्रवाह तनिक बाधित हुई तो सारा मिसरा लाख अच्छी कहन के कमज़ोर हो जाता है. आपने त्रिकल शब्दों की संभावनाओं का स्थान तय कर दिया है जो कि एक बन्धन की तरह सामने आया है. जबकि होना यह चाहिए था कि मिसरों में त्रिकल का स्थान खुला होता. इससे आपके शाइर को मात्रिकता के निर्वहन में सहजता होती.  

उपर्युक्त संदर्भ में योंतो सारे मिसरों पर आप एक बार काम करलें, लेकिन  चाह रहे हैं छू लें लेकिन, रूठने से हम डर जाते.. इस मिसरे को फिर से सहज करने की कोशिश करें, पंकज भाई.

वैसे इस बहर पर और इसके विन्यास पर तो आपसे टेलिफोन पर लम्बी बात हो चुकी है. 

शुभेच्छाएँ 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 3, 2016 at 8:13pm
आदरणीय समर सर सादर प्रणाम, तारीफ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Samar kabeer on June 3, 2016 at 2:30pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब,ग़ज़ल अच्छी हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।

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