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गजल(आग जंगल में लगी.....)

2122 2122 212

आग जंगल में लगी बुझती कहाँ
तीलियों-सी रौ समंदर की कहाँ।1

रस धरा का पी रहे बरगद खड़े
लग रहा है जिंदगी यूँ जी कहाँ।2

लाज ढ़कने का उठा बीड़ा लिया
तार होता है वसन जो सी कहाँ।3

अब लजाने का जमाना लद गया
यह नयन बहता जुबानी भी कहाँ।4

साथ चलने का भरा था दम कभी
दिख रहा मझधार में वह ही कहाँ।5

आँसुओं में घुल गये कितने शिखर
है पिघलता आज भी यह जी कहाँ।6

सुन रहा कब से जमाने की सदा
कह सका मैं बात भी अपनी कहाँ।7

स्वप्न जो अपने अधूरे, कह रहे-
थातियाँ हमने किसी को दी कहाँ।8

आरजू के ढेर पर बैठा 'मनन'
सोचता है सुध किसीने ली कहाँ।9
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on June 8, 2016 at 10:49pm
आभार आपका आ. नरेंद्र जी।
Comment by Manan Kumar singh on June 8, 2016 at 10:48pm
हैसला आफजाई के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भाई।
Comment by narendrasinh chauhan on June 8, 2016 at 11:23am

खूब सुन्दर रचना 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 8, 2016 at 8:12am

आरजू के ढेर पर बैठा 'मनन'
सोचता है सुध किसीने ली कहाँ  -- क्या बात है , आ. मनन भाई अच्छी गज़ल और इस मक्ते के लिये हार्दिक बधाई आपको ।

Comment by Manan Kumar singh on June 5, 2016 at 10:26pm
आभार आपका आ. महर्षि जी।
Comment by maharshi tripathi on June 5, 2016 at 8:38pm
अच्छी गज़ल कही है,आ मनन जी

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