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हे! जगदीश! सुनो विनती

'मत्तगयन्द सवैया'

हे! जगदीश! सुनो विनती अब, भक्त तुम्हें दिन-रैन पुकारे।
व्याकुल नैन निहार रहे मग, दर्शन को तव साँझ-सकारे।
कौन भला जग में तुम्हरे बिन, संकट से प्रभु ! मोहि उबारे?
आय करो उजियार प्रभो ! हिय, जीवन के हर लो दुख सारे।।1।।

'दुर्मिल सवैया'

जय हे जगदीश! कृपा करके, कर आय प्रभो! मम शीश धरो।
तुम मूरत बुद्धि-दया-बल के, सदबुद्धि-दया-बल दान करो।
शुचि ज्ञान-प्रकाश बहा प्रभु हे ! मन के तम-पाप-प्रमाद हरो।
हर लो हर दुर्बलता हिय के, उर धीरज-साहस-शक्ति भरो।।2।।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 15, 2016 at 10:51pm

बहुत ही सुन्दर आदरणीय 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 15, 2016 at 11:10am

आदरणीय राम बली भाई , दोनो सवैया बहुत सुन्दर लगा , अच्छी रचना हुई है , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by रामबली गुप्ता on June 13, 2016 at 7:21pm
सराहना और सुझाव के लिए हृदय से आभार आद0 सौरभ जी
Comment by रामबली गुप्ता on June 13, 2016 at 7:20pm
रचना पर भावपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए हृदय से आभार आद0 सुशील सरना जी।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 13, 2016 at 3:18pm

दोनों सवैया छन्द नियमानुसार गणों के संतुष्ट करते हुए हैं. हार्दिक बधाई. 

क्या आप सवैया छन्द की भाषा को खड़ी रखते हुए, रचनाकर्म कर सकते हैं ? प्रयास कर देखिये. 

शुभेच्छाएँ

Comment by Sushil Sarna on June 13, 2016 at 2:36pm

 आदरणीय रामबली गुप्ता जी भक्ति रस में डूबे आपके ये 'मत्तगयन्द सवैया' और दुर्मिल सवैया' बहुत ही सुंदर और संदेशप्रद सृजित हुए हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकार करें सर। 

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