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चाय की पत्ती (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"भाभी, चाय खौल चुकी है, कहाँ खोई हुई हो तुम!" देवरानी ने गैस चूल्हा बंद करते हुए जिठानी से कहा।
"ओह, मैं चाय की पत्ती के बारे में सोच रही थी!"
"क्यों?"
"मैं भी यहाँ चाय की पत्ती ही तो हूँ!"
"क्या मतलब?"
"बिना शक्कर के सबको चाय कड़वी ही तो लगती है, मिठास मिले तो सबको मीठी चाय भाये!"
"लेकिन चाय मीठी हो या फीकी, रिश्ते मधुर बनाने में एक पहल तो करती ही है, बस यह ध्यान रहे कि कहां फीकी चलेगी और कहां मीठी!"
"सही कहा तुमने, लेकिन नौकरी पेशा औरत को जब मध्यमवर्गीय परिवार में प्यार ही न मिले तो!" भीगी आँखों से देवरानी की ओर देखकर जिठानी ने कहा- " मैं सुंदर नहीं हूँ तो क्या हुआ, मैंने हर तरह से पहल की, लेकिन मैं सबको कड़वी ही लगी न ! नौकरी और घर-गृहस्थी के साथ रिश्ते निभाते हुए बस थोड़ा सा सच्चा प्यार पति और ससुराल से मिल जाता तो कितना अच्छा होता!"
"हाँ, रिश्ते और ज़िन्दगी मधुर हो जाती! लेकिन मीठी चाय पसंद करने वाले बिना शक्कर डाले ही मीठी चाय की ख़्वाहिश रखें, तो चाय की पत्ती का क्या कसूर!"

[मौलिक व अप्रकाशित]

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 20, 2016 at 4:48am
रचना के अवलोकन व सुझाव देने के लिए बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी।
Comment by maharshi tripathi on June 16, 2016 at 10:25pm
बढिया लघुकथा हुई है आ.सर पर थोड़ा और बेहतर हो सकती थी .,
नयी सोच हेतु बधाई आपको !!!
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 16, 2016 at 8:09pm
हमेशा की तरह मेरी रचना को समय देने व स्नेहिल प्रोत्साहन देने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 16, 2016 at 8:07pm
रचना-पटल पर समय देकर अनुमोदन करने व स्नेहिल हौसला अफ़ज़ाई हेतु तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरमा राजेश कुमारी साहिबा।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 16, 2016 at 8:06pm
मेरी इस ब्लोग पोस्ट पर उपस्थित हो कर समालोचनात्मक टिप्पणी द्वारा प्रोत्साहित व मार्गदर्शित करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। परिवार के दूसरे सदस्यों का पक्ष अनकहे में अप्रत्यक्ष रूप से समाहित है, हालाँकि एकाध संवाद में कुछ शब्दों से वह दूसरा पक्ष भी उभारा जा सकता था। शब्द कटौती व कहानी रूप से बचाव के चक्कर में कभी कभी ऐसा भी होता है।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 16, 2016 at 8:01pm
जी बिलकुल, आप सुधीजन की टिप्पणियों से ही हम रचना की कमियों को जान पाते हैं। रचना पर समय देकर अनुमोदन करने व विचार साझा करने के लिए तहे दिल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय डॉ. आशुतोष मिश्रा जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 16, 2016 at 7:58pm
रचना-पटल पर समय देकर अनुमोदन करने व विषयांतर्गत अपने विचार साझा करते हुए समीक्षात्मक टिप्पणी द्वारा प्रोत्साहित करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया कान्ता राय जी। हाँ, रचना बेहतर हो सकती थी। जैसा कि आ. प्रतिभा पाण्डेय जी ने भी अपनी राय में बताया। हालाँकि कुछ अनकहे में भी है अप्रत्यक्ष रूप में।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 15, 2016 at 5:15pm

आदरनीय शेख शहज़ाद भाई , रिश्तों की सच्चाई को चाय के सापेक्ष रख बहुत सुंदर और सार्थक बात कही आपने । आपको हार्दिक बधाई कथा के लिये ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 14, 2016 at 8:17pm

"हाँ, रिश्ते और ज़िन्दगी मधुर हो जाती! लेकिन मीठी चाय पसंद करने वाले बिना शक्कर डाले ही मीठी चाय की ख़्वाहिश रखें, तो चाय की पत्ती का क्या कसूर!"बहुत गहन पंच लाइन हुई जो लघु कथा को मायने देती है  हार्दिक बधाई आ० उस्मानी जी 

Comment by pratibha pande on June 14, 2016 at 6:50pm

यहाँ  एक पक्षीय वार्तालाप हो रहा है जहाँ पर नायिका  के पक्ष ने  पूरी कथा को घेर रखा है ,अगर समझदार देवरानी थोडा पक्ष घर के दूस्ररे लोगों का भी रखती पञ्च लाइन में तो कथा में  संतुलन ज्यादा होता.  चाय की  पत्ती का जिक्र नयापन लिए है  हार्दिक  बधाई आपको इस प्रस्तुति के लिए आदरणीय उस्मानी जी      

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