हम के अस्तित्व से ....
बड़ा लम्बा सफर
तय करना पड़ता है
अंतस की व्यथा को
अधरों तक आने में
स्मृतिकोष के
पृष्ठों से किसी की
याद को मिटाने में
अनकहा
कुछ नहीं रहता
अवसाद के पलों में
अभिव्यक्ति
पलकों के पालने से
कपोलों पर
हौले हौले सरकती
किसी स्पर्श के इंतज़ार में
ठहर जाती है
शायद कोई
अपनत्व का परिधान ओढ़ कर
इक बूंद में समाये
विछोह के लावे को
अपनी उंगली के पोरों से उठा ले
और चुपके से मेरे कानों में
अपनी सांसों से कह दे
मैं
तुम्हें
हम के अस्तित्व से
अलग न होने दूंगा
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
अादरणीय डॉ विजय शंकर जी प्रस्तुति के भावों को मान देने का दिल से अाभार।
अादरणीय सुरेश कुमार कल्याण जी अपकी मधुर प्रशंसा का दिल से अाभार।
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