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दिलों मेंं लिपटे साये थे ....

दिलों मेंं लिपटे साये थे ....

दोनों उरों मेंं
हुई थी हलचल
जब दृग से दृग
टकराये थे
दृग स्पर्श से मौन हिया के
स्वप्न सभी मुस्काये थे
अधरों पर था लाज़ पहरा
लब न कुछ कह पाए थे
अवगुण्ठन मेंं वो अलकों के
कुछ सकुचे शरमाये थे
झुकी पलक के देख इशारे
हम मन मेंं मुस्काये थे
मधु पलों को सिंचित करने
स्नेह घन घिर अाये थे
हुअा सामना जब हमसे तो
वो सिमटे घबराये थे
हौले हौले कैद हुए हम
इक दूजे की बाहों मेंं
होते ही हल्की सी छुअन वो
पत्ते से थर्राये थे
हल्की हल्की थी फुअारें
और सांसों का शोर था
कहने को हम दूर दूर थे
पर दिलों मेंं लिपटे साये थे


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित



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Comment by Sushil Sarna on July 7, 2016 at 8:36pm

अादरणीय रामबली गुप्ता जी प्रस्तुति पर अापकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक अाभार। अाप ने बिल्कुल सही पकड़ा । शुरू तो मैं तुकांतता से हुअा था फिर बीच मेंं भाव संप्रेषण के चक्कर मेंं अतुकांतता पे अा गया। कभी कभी हो जाता है। इस बिंदु हेतु अापका हार्दिक अाभार। 

Comment by रामबली गुप्ता on July 7, 2016 at 5:12pm
भावों का बेहतरीन सम्प्रेषण आद0 सुशील सरना जी हार्दिक बधाई
किन्तु इसका शिल्प न समझ पाया। अतुकांत में प्रयास है या तुकांत में यदि तुकांत का प्रयास है तो मुझे कतिपय स्थानों पर अटकाव लगा।सादर

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