For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

बाला छंद ,वर्ण वृत्त (मुक्तक )

२१२ २१२ २१२ २

आदमी आदमी का सहारा

एक साथी बिना क्या गुजारा

गीत को साज भी है जरूरी

नाव भी ढूँढती है किनारा  

 

धूप है तो यहाँ छाँव भी है

राह के बीच में ठाँव भी है

सोचता क्या चला आ बटेऊ

खेत है पास में गाँव भी है

 

शान्ति के मार्ग जाऊँ कहाँ से

ज्ञान का दीप लाऊँ कहाँ से

लोभ ने मोह ने राह रोकी

मोक्ष मैं  आज पाऊँ कहाँ से

 

देश में बीज क्या बो रहे हैं

क्यूँ बुरे हादसे हो रहे हैं

एक है काटता दूसरे  को

पेड़ ये देख के रो रहे हैं

 

हाथ में फूल भी तीर भी हो

दूध में छाछ भी खीर भी हो

एक दूजे बिना हैं अधूरे

आँख में लाज भी नीर भी हो

 

मौलिक एवं अप्रकाशित  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Views: 1044

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 30, 2016 at 6:23pm

जी आद० गोपाल भाई जी,ग़ज़ल में जिन्हें हम  रुक्न कहते हैं छंदों में वर्ण समूह होते हैं यहाँ इस छंद में ख़ास बात ये है कि इसमें २ को ११ नहीं कर सकते अतः दीर्घ की ही बंदिश है आपको छंद पसंद आया बहुत- बहुत आभार आपका| 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 30, 2016 at 6:16pm
आआ० दीदी क्या यह
बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आख़िर
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ा
212 212 212 2------------------------- नहीं है . बाला छंद कभी सुना ही नहीं. इसके बारे में विस्तार से बताइए
आपकी कविता उत्कृष्ट है . खासकर यह पंक्ति - एक दूजे बिना हैं अधूरे आँख में लाज भी नीर भी हो

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 29, 2016 at 12:15pm

आदरणीय समर भाई जी ,अपनी प्रतिक्रिया से रचना का मान बढ़ाने के लिए तहे दिल से शुक्रिया सादर |

Comment by Samar kabeer on July 28, 2016 at 3:33pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,इस सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति के लिये बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 27, 2016 at 9:17pm

आद०  श्याम नारायण वर्मा  जी ,आपको छंद पसंद आये दिल से बहुत बहुत आभार आपका |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 27, 2016 at 9:17pm

आद०  सुशील सरना जी ,आपको छंद पसंद आये दिल से बहुत बहुत आभार आपका |

Comment by Shyam Narain Verma on July 27, 2016 at 4:01pm

बहुत सुन्दर भावों से सजी रचना बहुत 2 बधाई

सादर

Comment by Sushil Sarna on July 27, 2016 at 1:54pm

हाथ में फूल भी तीर भी हो
दूध में छाछ भी खीर भी हो
एक दूजे बिना हैं अधूरे
आँख में लाज भी नीर भी हो

वाह आदरणीया राजेश कुमारी जी भावों की बहुत सुंदर प्रस्तुति हुई है। इस मधुर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
50 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
1 hour ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।संबंधों को निभा रहे, जैसे हो दस्तूर…See More
16 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
yesterday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आजकल खूब हो रहा है ये चलन और कभी कभी विवाद भी। आपकी चिरपरिचित शैली में विचारोत्तेजक लघुकथा। बधाई…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service