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दिल के निहाँ ख़ाने में ....

दिल के निहाँ ख़ाने में ....

लगता है शायद
उसके घर की कोई खिड़की
खुली रह गयी
आज बादे सबा अपने साथ
एक नमी का अहसास लेकर आयी है
इसमें शब् का मिलन और
सहर की जुदाई है
इक तड़प है, इक तन्हाई है
ऐ खुदा
तूने मुहब्बत भी क्या शै बनाई है
मिलते हैं तो
जहां की खबर नहीं रहती
और होते हैं ज़ुदा
तो खुद की खबर नहीं रहती
छुपाते हैं सबसे
पर कुछ छुप नहीं पाता
लाख कोशिशों के बावज़ूद
आँख में एक कतरा रुक नहीं पाता
हिज्र की रातों में सितारों से बतियाते हैं
खामोश लम्हों से
बारहा उनके अक्स चुराते हैं
अक्स
जिनमें उसके आरिज़ों पर
हया की अरुणाई है
अक्स
जिसमें उसके लबों पर
प्यास थरथराई है
अक्स
जिसमें वो बे-हिज़ाब आई है
आज उसकी याद ने
मेरे दिल के निहाँ ख़ाने में
ली एक अंगड़ाई है
पेशानी पे मुहब्बत की यारो
इक लफ्ज़ लिखा तन्हाई है
न उसको ये रास आई है
न मुझको ये रास आई है


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 29, 2016 at 12:53pm

आदरणीया प्रतिभा पांडेय जी प्रस्तुति को अपनी आत्मीय प्रशंसा से मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Samar kabeer on July 28, 2016 at 10:29pm
एक बात कहना भूल गया था, "निहाँ खाने"इस तरह लिखें,'निहाँखाने' ऐसे नहीं ।
Comment by pratibha pande on July 28, 2016 at 10:05pm

सुन्दर  शब्द  चयन के साथ गहरे  भाव सम्प्रेषण .. हार्दिक बधाई प्रेषित है आपको इस खूबसूरत रचना के लिए आदरणीय सुशील सरना जी 

Comment by Sushil Sarna on July 28, 2016 at 7:34pm

आदरणीय समर कबीर जी प्रस्तुति में निहित भावों को अपनी उत्साहवर्धक टिप्पणी से अलंकृत करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Samar kabeer on July 28, 2016 at 2:57pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,हमेशा की तरह आपकी रचना में सुंदर भाव के साथ खूबसूरत अल्फ़ाज़ मोती की तरह जड़े हुए प्रतीत हो रहे हैं,इस शानदार प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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