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"बता जल्दी, कहाँ छुपा रखा है कमांडर को तुम लोगों ने", नशे में धुत्त और गुस्से के कांपते हुए दरोगा ने कस के एक लाठी मारी| मरियल सा आधी हड्डी का रग्घू लाठी पड़ते ही बाप बाप चिल्लाते हुए जमीन पर लेट गया| पीठ पर जहाँ लाठी पड़ी थी, वहां जैसे आग लग गयी थी उसके, लेकिन अब इतनी हिम्मत भी नहीं बची थी कि वो उठ पाए|
"साला, नाटक करता है, बहुत मोटी चमड़ी है इन सभो की, ऐसे नहीं बताएगा" कहते हुए दरोगा ने एक बार फिर लाठी उठायी| रग्घू जमीन पर पड़े पड़े फटी आँखों से देख रहा था, उसने अपने हाथ ऊपर उठा दिए| तब तक बगल में खड़े हवलदार ने लाठी पकड़ ली|
"अरे साहब, मर जायेगा ये, देखते नहीं, जान नहीं है इसके शरीर में", लाठी लेते हुए उसने कहा|
"ये सब इतनी जल्दी कहाँ मरते हैं| ठीक है अब तुम पूछो इससे, अगर फिर भी मुंह नहीं खोला तो और ढुकाई करता हूँ इसकी" कहते हुए दरोगा अपने कमरे की ओर बढ़ा| कुर्सी पर बैठकर उसने टांग मेज पर रखा और दारू की बोतल गटकने लगा|
हवलदार भी उसी तरफ का था और उसको थोड़ी हमदर्दी भी थी उन लोगों से| उसने रग्घू को उठाया और पानी का बोतल उसकी ओर बढ़ा दिया| रग्घू के हाथ कांप रहे थे, बोतल गिर पड़ी, जल्दी से उसने उठाया और थोड़ा पानी अंदर धकेला|
"देख रग्घू, ये दरोगा बिलकुल जानवर है, अगर जानता है तो बता दे, वर्ना मार डालेगा तुझको", हवलदार ने समझाते हुए कहा|
"अरे साहब, हमको तो इ भी नहीं मालूम कि इ कमांडर क्या है और कौन है| हमें तो किसी तरह अपना पेट भरने को मिल जाए, बस यही में दिन रात बीतता है| पिछले साल अपना लड़का भी गँवा बैठे थे जंगल में, आप ही बचा सकत हो हमको,", कहते कहते रग्घू फूट फूट कर रोने लगा|
"अच्छा, वो तुम्हारा लड़का था जिसे उन लोगों ने मार दिया था", हवलदार को याद आया| पुलिस का मुखबिर होने के संदेह में गिरोह के लोगों ने एक नौजवान को गोली मार दी थी|
"अब का बताएं साहब, उधर लड़का गवा पुलिस के साथ होये के सुबहा में और इधर पुलिस हमका मार डाली गिरोह के साथ होये के सुबहा में| अब तो जंगल के अंदर भी मरन है और बाहर भी, जियल ही मुश्किल है हम लोगन का", रग्घू सिसकते हुए लेट गया जमीन पर|
हवलदार सन्न हो गया, उसने एक बार फिर उठाया रग्घू को और दीवार से सहारा देकर बैठा दिया|
"मैं बात करता हूँ दरोगा से, शायद मान जाये, नहीं तो तुम्हारी किस्मत", बुझे मन से बोलता हुआ वो दरोगा के कमरे की तरफ बढ़ा| उसने अंदर झाँका, दरोगा दारू की बोतल खाली करके कुर्सी पर ही लुढ़क गया था|
थके क़दमों से वो बाहर निकला और जाकर चबूतरे पर बैठ गया| चारो तरफ अँधेरा सांय सांय कर रहा था, उसने अपनी कमीज उतारी और बगल में रख दिया| अचानक उसके मुह से अपनी बेबसी पर जोर की रुलाई फूट पड़ी, उसके दिमाग में अंदर पड़ा मरियल रग्घू घूम रहा था जिसे बचा पाने का हौसला वो खोता जा रहा था|
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on August 17, 2016 at 1:32pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ कल्पना भट्ट जी 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 17, 2016 at 9:56am
गरीबों की पुकार कौन सुने । मार्मिक कथा । हार्दिक बधाई सर।
Comment by विनय कुमार on August 15, 2016 at 6:07pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ सतविंदर कुमार जी 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 15, 2016 at 4:22pm
बहुत् खूब आदरणीय विनय कुमनक्सलवाद ने जाने कितने ही गरीबों की ऐसे शक में ही जान ले ली।सार्थक कथा के लिए हार्दिक बधाई।

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