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पकड़कर हाथ राधा का चले जो नूर का बेटा (फिल्बदीह ग़ज़ल 'राज '

पड़े आफ़ात तो छुपता किसी मशहूर का बेटा 
कलेजा शेर का रखता मगर मजदूर का बेटा 

कहीं ऊपर जमीं के उड़ रहा मगरूर का बेटा 
जमीं को चूमता चलता किसी मजबूर का बेटा

कई तलवार बाहर म्यान से आती दिखाई दें  
पकड़कर हाथ राधा का चले  जो नूर का बेटा

सिखाने पर परायों के भरा है जह्र नफरत का 
चला हस्ती मिटाने को कोई अखनूर का बेटा

कदम पीछे हटा लेता जहाँ उसकी जरूरत हो 
हर इक रहबर फ़कत कहने को है जम्हूर का बेटा 

सरापा थाम लेती है तुम्हें अंगूर की बेटी 
अगर होता तो क्या देता तुम्हें अंगूर का बेटा 

हुनर में डूब कर उसके कलम करता ग़ज़ल गोई 
ग़ज़ल में नाम उसका लिख दिया संतूर का बेटा

--------मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by rajesh kumari on August 24, 2016 at 5:58pm

प्रिय राहिला जी,आपकी नवाजिश है  बहुत बहुत शुक्रिया  आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ |

Comment by Samar kabeer on August 24, 2016 at 3:22pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,फिल्बदीह ग़ज़ल कहने में आपको मल्का हासिल है, ये में पहले भी कह चुका हूँ,बहुत उम्दा और मुरस्सा ग़ज़ल हुई है, शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं
तीसरे शैर में 'तलवार'को "तलवारें"करना मुनासिब होगा क्या ?
चौथे शैर में "अखनूर"का अर्थ बताने का कष्ट करें ।
Comment by Rahila on August 24, 2016 at 10:32am
पड़े आफ़ात तो छुपता किसी मशहूर का बेटा
कलेजा शेर का रखता मगर मजदूर का बेटा

कहीं ऊपर जमीं के उड़ रहा मगरूर का बेटा
जमीं को चूमता चलता किसी मजबूर का बेटा

कई तलवार बाहर म्यान से आती दिखाई दें
पकड़कर हाथ राधा का चले जो नूर का बेटा।।वाह...वाह, बेहद शानदार ग़ज़ल आदरणीया दीदी!हर एक शेर उम्दा बने है। बहुत, बहुत बधाई।सादर

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