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बह्र : २२ २२ २२ २२

 

सब खाते हैं एक बोता है

ऐसा फल अच्छा होता है

 

पूँजीपतियों के पापों को

कोई तो छुपकर धोता है

 

एक दुनिया अलग दिखी उसको

जिसने भी मारा गोता है

 

हर खेत सुनहरे सपनों का

झूठे वादों ने जोता है

 

महसूस करे जो जितना, वो,

उतना ही ज़्यादा रोता है

 

मेरे दिल का बच्चा जाकर

यादों की छत पर सोता है

 

भक्तों के तर्कों से ‘सज्जन’

सच्चा तो केवल तोता है

----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 10, 2016 at 10:56pm

शुक्रिया जनाब तस्दीक अहमद साहब। इस बह्र में लयभंग न हो तो २२२ को १२१२ या २११२ की छूट ले सकते हैं

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 10, 2016 at 10:54pm

शुक्रिया जनाब समर कबीर साहब। आप के सुझावों के लिए तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 10, 2016 at 10:54pm

शुक्रिया आदरणीय गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 10, 2016 at 10:51pm

शुक्रिया आदरणीया राहिला जी

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 25, 2016 at 9:23pm

जनाब महेंद्र साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है  मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ---शेर 3 ,4  और 5 का ऊला मिसरा बहर में नहीं है ,देख लीजियेगा 

Comment by Samar kabeer on August 25, 2016 at 6:03pm
जनाब धर्मेंद्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल अच्छी हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
मतले के ऊला मिसरे में 'एक'को "इक"करलें ।
तीसरे शैर का ऊला मिसरा लय में नहीं लगता,देखियेग ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2016 at 5:52pm

महसूस करे जो जितना, वो,

उतना ही ज़्यादा रोता है              .... जीवन की सच्चाई बता दी आपने ।

गज़ल भी बहुत बढिया कही है , सभी शे र अच्छे लगे । हार्दिक बधाइयाँ आपको ।

Comment by Rahila on August 25, 2016 at 1:47pm
मेरे दिल का बच्चा जाकर
यादों की छत पर सोता है,वाह...कितना खूबसूरत शेर कहा आपने आदरणीय!वैसे तो हर शेर ही शानदार बन पड़ा ।खूब बधाई इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए।सादर

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