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ग़ज़ल - लिखता मिला मज़ार पे अरमान आदमी

2212 121 1221 212
खोने लगा यकीन है अनजान आदमी ।
जब से बना है मौत का सामान आदमी ।।

बाज़ार सज रहे हैं नए जिस्म को लिए ।
बनकर बिका है मुल्क में दूकान आदमी ।।

ठहरो मियां हराम न खैरात हो कहीं ।
माना कहाँ है वक्त पे एहसान आदमी ।।

दरिया में डालता है वो नेकी का हौसला ।
देखा खुदा के नाम परेशान आदमी ।।

मजहब तो शर्मशार तेरी हरकतों पे है ।
कुछ मजहबी इमाम भी शैतान आदमी ।।

मतलब परस्तियों का जरा देखिये सितम ।

बेचा है मोल भाव पे ईमान आदमी ।।

दौलत से आरजू का फ़कत वास्ता यही ।
लिपटा कफ़न के दाम में शमशान आदमी ।।

शातिर लिखा गया है उसी आम सख़्श को ।
जिसको कहा गया था है नादान आदमी ।।

शायद मुगालतों में जिए जा रहा है वो ।
लिखता मिला मजार पे अरमान आदमी ।।


-नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 1, 2016 at 10:08pm

आदरणीय नवीन भाई , अच्छी गज़ल कही है दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें ,आदरणीय समर भाई जी की बातों का खयाल कीजियेगा।

Comment by Naveen Mani Tripathi on September 1, 2016 at 9:18pm
आदरणीय रामबली गुप्ता जी सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 1, 2016 at 9:17pm
आदरणीय कबीर सर विशेष आभार ।
Comment by रामबली गुप्ता on September 1, 2016 at 6:28pm
वाकई शेर दर शेर बेहतरीन ग़ज़ल हुई है। आद0 समर भाई जी से सहमत हूँ।
Comment by Samar kabeer on August 31, 2016 at 6:02pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
पांचवें शैर के ऊला मिसरे में'शर्मशार' को "शर्मसार"कर लें ।
इसी तरह आठवें शैर के ऊला मिसरे में 'सख्श'को "शख़्स" कर लें ।

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