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घोड़े

दौड़ते हुए घोड़े
सरपट अपनी रफ़्तार में
अपने ही कदम
अपनी ही डगर
न रुकते ना ही थकते
कभी चलते
कभी बहकते
दौड़ते रहते
बस
दौड़ते रहते
एक सफर से दूसरे की ओर
न जाने कोई होता भी है छोर
कभी होती काँटों की चुभन
कभी धुप से जलते है पैर
कभी मिल जाती है छाँव बरगद की
कभी नुकीली होती है सैर ।
रुक गए कदम कहीं ।
तो दिखती है सामने
बाहें फैलाती राह
अंजान ही सही ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 9, 2016 at 9:53pm

धन्यवाद आदरणीया अलका जी |

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 9, 2016 at 9:31pm

सुंदर प्रस्तुति हार्दिक बधाई आद० कल्पना जी 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 1, 2016 at 10:24pm
धन्यवाद आदरणीय रामबली गुप्ता जी ।
Comment by रामबली गुप्ता on September 1, 2016 at 6:24pm
बहुत ही सुंदर प्रस्तुति आद० कल्पना जी दिल से बधाई लीजिये
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 29, 2016 at 10:19pm
धन्यवाद आदरणीय सुरेश जी ।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 29, 2016 at 5:33pm
आदरणीया कल्पना भट्ट जी इस सुंदर रचना पर हार्दिक बधाई प्रेषित है । सादर ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 29, 2016 at 3:38pm
जनाब समर साहब आदाब । आपको यह कवित्व पसंद आयी सार्थक हुआ मेरा यह प्रयास । हार्दिक धन्यवाद आदरणीय ।
Comment by Samar kabeer on August 29, 2016 at 2:41pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,बहुत सुंदर लगी आपकी कविता,अछूता विषय,बहुत ख़ूब,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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