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दोहे (एक प्रयास ) /अलका चंगा

छोटे मुँह की बात भी,ऊँची राह सुझाय ।
सीख कहीं से भी मिले, सीखो ध्यान लगाय ।।

औरन को अपना कहें , सुनते उनकी बात ।
अपनों की सुध है नहीं, उनसे करते घात।।

ऐसा नाम कमाइए, मन के खोले द्धार ।
अपनों की सुध लीजिये, बढे प्रेम व्यव्हार ।।

खुशियों की खामोशियां , खा जाती सुख चैन।
यादें ना हो साथ तो ,दिन बीते ना रैन ।।

.

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 20, 2016 at 4:20pm

रचना की सराहना हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय  सुरेश कुमार कल्याण  जी   

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 18, 2016 at 3:39pm
आदरणीया अल्का चंगा जी बहुत ही सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई प्रेषित है । सादर ।
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 15, 2016 at 8:35pm

रचना की सराहना हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय  आदित्य जी   

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 15, 2016 at 8:33pm

आदरणीय  सौरभ जी ,प्रस्तुति पर आपकी उपस्थिति  और सुझाव के लिए हार्दिक अभिनन्दन।  आपके द्वारा रचना का १०% पर भी पास होना भी मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।उचित मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद मैं पूरी कोशिश करुँगी  कि इस मंच से  कुछ सीख सकूँ । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 15, 2016 at 6:05pm

दोहा छन्द में प्रस्तुत हुई  भाव-दशा को यदि प्रचलित भाषा में प्रस्तुत करने की कोशिश हुई होती तो संभवतः यह प्रस्तुति और अधिक प्रासंगिक होती. 

आदरणीया अलका जी, आपकी छन्दों को लेकर मात्रिक समझ विकसित हुई दिख रही है. आप अपनी भाषा को भक्ति-काल की भाषा-दशा के व्यामोह से बाहर निकालिये, आपकी प्रस्तुतियाँ अवश्य पठनीय हो उठेंगीं. 

सादर शुभेच्छाएँ. 

Comment by Aditya Kumar on September 15, 2016 at 5:31pm

बहुत सुन्दर रचना आदरणीया Alka Changa जी , बहुत बहुत शुभकामनायें।  

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