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ग़ज़ल - क्या आपके दिल में है ?बता क्यों नहीं देते?

ग़ज़ल
क्या आपके दिल में है,बता क्यों नहीं देते ?
नजरों से मेरी पर्दा उठा क्यों नहीं देते ?

ये किसलिये अहसान के नीचे है दबाया?
मुझको मेरी कमियों की सज़ा क्यों नहीं देते ?

कुछ गलतियाँ करवाती हैं मज़बूरियाँ सबसे
तुम तो बड़े हो गलती भुला क्यों नहीं देते?

हालाँकि सराबोर महब्बत से हूँ लेकिन
मौसम ये बहारों के मज़ा क्यों नहीं देते?

ये कौन ज़ुदा शख्स मेरे पीछे पड़ा है
सब पूछते हैं मुझसे,बता क्यों नहीं देते ?

जो शख्स यहाँ आहे महब्बत की वजह है
उस शख्स को दुनिया से मिला क्यों नहीं देते ?

ये दर्द महब्बत का महब्बत के लिए है
इस दर्द को और -और बढ़ा क्यों नहीं देते ?

क्यों सामने अनजान के रोया है "सुजान"आज
सीने में हुआ जख़्म दिखा क्यों नहीं देते ?

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by सूबे सिंह सुजान on September 23, 2016 at 12:14pm
हालाँकि शराबोर महब्बत से हूँ लेकिन
मौसम ये बहारों के मज़ा क्यों नहीं देते?

शराबोर को सही किया गया है
Comment by सूबे सिंह सुजान on September 23, 2016 at 12:12pm
अशोक कुमार राक्तले,जी शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया ।
Comment by सूबे सिंह सुजान on September 23, 2016 at 12:11pm
रवि शुक्ला,जी आपने सही कहा । बहर,अर्कान यही है ।
Comment by सूबे सिंह सुजान on September 23, 2016 at 12:10pm
शिज्जू शकूर जी,आभार व्यक्त करता हूँ आप सही फरमा रहे हैं ।ध्यान रखूँगा
Comment by Ashok Kumar Raktale on September 22, 2016 at 10:08pm

आदरणीय सूबे सिंह सूजान साहब वाह ! खूब उम्दा गजल कही है. बहुत मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं. सादर.

Comment by Ravi Shukla on September 21, 2016 at 3:45pm
आदरणीय सूबे सिंह जी बढ़िया ग़ज़ल कही आपने दाद हाज़िर है आदरणीय समर साहब के सुझाव से यकीनन अशआर में निखार आएगा । बह्र हमारे खयाल से 221 1221 1221 122 है । लिख दिया करें तो समझने में आसानी रहती है ।

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Comment by शिज्जु "शकूर" on September 21, 2016 at 2:38pm

आदरणीय सूबे सिंह सुजान जी अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई आपको, शेष आपकी समर कबीर साहब से चर्चा हो ही गई है

Comment by सूबे सिंह सुजान on September 20, 2016 at 10:13pm
सुरेश कुमार कल्याण जी,आपकी प्रतिक्रिया पर हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ ।
Comment by सूबे सिंह सुजान on September 20, 2016 at 10:12pm
Samar kabeer,जी आपने शराबोर के बारे ठीक बताया, मिसरों को ठीक किया है शुक्रिया शुक्रिया ।
आपने ग़ज़ल को ध्यान देकर ठीक किया है ।
हाँ बहर अर्कान नहीं लिख पाया । मुआफी चाहता हूँ । भविष्य में ध्यान रखूँगा ।
Comment by Samar kabeer on September 20, 2016 at 6:30pm
जनाब सूबे सिंह सुजान साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल कही आपने दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
चौथे शैर में सही शब्द है "शराबोर"
सातवें शैर में 'और'शब्द दो बार आ गया है,सानी मिसरा मुनासिब समझें तो यूँ कर लें:-
"इस दर्द को तुम और बढ़ा क्यों नहीं देते"
मक़्ते में शुतरगुरबा का दोष आ गया है,ऊला मिसरा मुनासिब समझें तो यूँ कर लें:-
"क्यों सामने अंजान के रोते हैं'सुजान'आप"
आपने ग़ज़ल पर अरकान नहीं लिखे जो नियम है मंच का ।

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