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बह्र 1222 1222 1222 1222


तेरी बस याद आने से सभी दुःख-दर्द टलतेे हैं।
तेरे ही नाम पे जीवन युँही हम काट चलते हैं।

गमों का दौर है आया नहीं सुख अब दिखाई दे
इसी में डूब कर अबतो सभी दिन-रात ढलते हैं।

यहाँ जो भी मुकम्मल है हिफाज़त को जमाने की
उसी के जह्न में देखो गलत अरमान पलते हैं।

कभी सोचा नहीं जिसने हो जाए अम्न ही कायम
लिए उम्मीद फिर ऐसी उसी के पास चलते हैं।

अदाकारी में जो माहिर समझ में वे नहीं आते
कभी तोला कभी माशा बहुत जल्दी बदलते हैं।

जिन्होनें बे रहम बनकर हमें बीमार कर डाला
बनें नादाँ हमारी वो इयादत को मचलते हैं।

खुदी के काम अच्छे हों यही इक सोच हो राणा
गलत जो काम करते हैं जमाने को वे छलते हैं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 28, 2016 at 8:59am
मोहतरम ज़नाब समर कबीर साहब,जनाब शिज्जु शकूर साहब और जनाब तस्दीक अहमद साहब मैं ग़ज़लकार नहीं हूँ।इस की कक्षा में एक अदना सा विद्यार्थी हूँ।यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि आप लोगों का शागिर्द ही हूँ।क्योंकि आप लोगों की ग़ज़लों को पढ़ते-पढ़ते लिखने की कोशिश कर बैठा।आदरणीय शकूर जी,जैसा कि मैं अपनी पहली टिप्पणी में कह चुका हूँ कि ईता है ऐसा भाआ तो मुझे हो गया है।पर कैसी ईता है यह अभी मैं समझ नहीं पाया हूँ।जो लिंक आपने शेयर किए हैं वे मेरे लिए बहुत उपयोगी हैं।निस्संदेह उन्हें भी मैंने पढ़ा था।तभी तो ईता के बारे में मुझे अंदाज़ा हु।आदरणीय तस्दीक अहमद जी आपने बेहद खूबसूरत मतला पेश किया है,उसके लिए शुक्रिया और मुबारकबाद।आप सब से एक गुज़ारिश करना चाहता हूँ।उर्दू में थोड़ा हाथ तँग है इसलिए मुझे इन चीजों को समझने में समय लग रहा है।निस्संदेह यह ग़ज़ल और समय और मेहनत माँग रही है।इसमें सुधार किया जाना भी अनिवार्य ही हो गया है।इसे मकीन करूँगा भी।पर पहले ईता के ऐब को पूरी तरह से समझ लेना ही मैं मुनासिब समझता हूँ।ताकि आगे के प्रयास इस ऐब से निरपेक्ष हों।आप सबने इस एक दोष के बारे में चर्चा करके मेरे मन में इसे बेहतरी से समझने की तीव्र इच्छा जागृत की है।इसके लिए मैं दिल की गहराई से शुक्रिया अता करता हूँ।और आप सब की शायराना शख्सियत को सलाम कहता हूँ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 27, 2016 at 8:41pm

जनाब सतविंदर कुमार साहिब , ग़ज़ल में अच्छे खयालात आपने लिए , एक अच्छी कोशिश , मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ----काफी चर्चा भी हो गयी , मोहतरम समर साहिब और मोहतरम शकूर साहिब ने जो कहा उसपे ध्यान देने की ज़रूरत है । यह तो ग़ज़ल लिखने वाला ही तय करता है कि क़ाफ़िया ,और रदीफ़ क्या है
मैंने जो महसूस किया उसके हिसाब से रदीफ़ " हैं " है और क़ाफ़िया चलते ,बदलते , ढलते ,पलते हैं । इस तरह आपको शेर 6 और 7 बदलने पड़ेंगे ,अगर आप मुनासिब समझें तो मतला यह करलें

हमारी आँख से आंसू तुम्हारे ही निकलते हैं
तुम्हारे नाम से जीवन यूँ ही हम काट चलते हैं

शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 27, 2016 at 6:08pm
Comment by Samar kabeer on September 27, 2016 at 5:29pm
इस हिसाब से तो पूरी ग़ज़ल में क़ाफ़िया दोष होना चाहिये, में सिर्फ़ ये मालूम करना चाहता हूँ कि इसमें ईता का दोष कैसे हुआ ?
जनाब शिज्जु शकूर साहिब।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 27, 2016 at 4:23pm

क़ाफ़िया 'चल'बन''बढ़'मुझे तो इसमें ईता नज़र नहीं आती/// चल और बढ़ क्या काफिया हो सकते हैं?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 27, 2016 at 4:18pm

मुहतरम जनाब समर कबीर साहब आप न सिर्फ वरिष्ठ हैं बल्कि आपकी जानकारी मुझसे कहीं ज़्यादा है इसलिए मैं पहले ही आप से मुआफी माँग लेता हूँ, जहाँ तक मेरी जानकारी है कि काफिये की पहली शर्त है हर्फं रवी का समान होना मतले में पढ़ते व चलते काफिया लिया गया है जिसके हर्फे रवी ढ व ल है तो ये हमकाफिया कहाँ से हुआ, मैं मुतमईन अब भी नहीं। शेष, ग़ज़ल सतविंद्र साहब की है वो जैसा चाहे रखें. 

Comment by Samar kabeer on September 27, 2016 at 3:22pm
आपकी रदीफ़ है 'ते हैं'और क़ाफ़िया 'चल'बन''बढ़'मुझे तो इसमें ईता नज़र नहीं आती ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 27, 2016 at 3:05pm
आदरणीया समर कबीर साहब आपके टीप को पढ़ने के बाद मैंने ईता से सम्बंधित आलेख ढूँढ कर पढ़ने शुरु किए।मैं ईता के बारे में पढ़ पाया यह तीन प्रकार की होती है।ईता-ए-जली(बड़ी ईता),ईता-ए-ख़फ़ी(छोटी ईता)और ईता-ए-हुस्न,इनमें ईता ए हुस्न ऐब न होकर एक खूबी है।बाकी छोटी ईता को आजकल के गज़लगो ज्यादा तवज्जो नहीं देते।पर बड़ी ईता एक बहुत बड़ा दोष है।अभी मैं इन तीन ईता के बारे में केवल पढ़ पाया।समझने में थोड़ा और समय लगेगा।बड़ी ईता का ऐब बिलकुल वैसे ही समझा जाएगा जैसा आदरणीया शिज्जु शकूर जी ने कहा है।इसमें जो मैंने पढ़ा है या मैं समझ पाया हूँ,उनके अनुसार 'ते' काफिया न होकर ते हैं रदीफ़ बन गया है।अब ते को अगर हटाया जाए तो 'पढ़' और 'चल' दोनों मूल सार्थक शब्द हैं।जो कि हम काफ़िया नहीं बनते हैं इस प्रकार से यहाँ ईता का ऐब तो नज़र आता है,अब यह बड़ी ईता है या छोटी यह मैं समझने की कोशिश कर रहा हूँ।के मार्गदर्शन के लिए शुक्रगुज़ार हूँ।आपका यह स्नेह यूँ ही बना रहे यह दिली अपेक्षा है।सादर नमन आदरणीय
Comment by Samar kabeer on September 27, 2016 at 2:46pm
मिसाल के तौर पर देखिये,मान लीजिये आपने रदीफ़ रखी 'जायेगा'और क़ाफ़िया रखा 'माना'अब इसके अगले मिसरे में इस रदीफ़ के साथ 'ज़माना'क़ाफ़िया लेंगे तो वो ईता का दोष कहलायेगा ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 27, 2016 at 12:05pm
आदरणीया समर कबीर साहब सादर नमन।आपने मेरी गुजारिश को स्वीकार किया और ईता-ए-जली ऐब के बारे में मिसाल के साथ समझाया,इसके लिए मैं तहेदिल शुक्रगुज़ार हूँ।इसे जहाँ तक मैं समझ पाया एक अक्षरी काफिया लेने पर यह दोष नहीं गिना जाता,जैसा कि मेरे प्रयास में 'ते' है।इसके अलावा अगर काफिया हर्फ में लें तो यह ऐब आ जाता है,जैसा आपके द्वारा दी गई मिसालों में नजर आया।सादर

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