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कठपुतले (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

हमेशा की तरह इस बार भी विजयादशमी मनाने के लिए बड़े से मैदान पर परम्परागत तरीके से बड़े परिश्रम और तन-मन-धन से व श्रद्धा भाव से बनाए गए तीन बड़े-बड़े से पुतले बड़े जन-समूह के बीच खड़े रामलीला प्रसंग के साथ ही अपने परम्परागत दहन की प्रतीक्षा में थे । मंच पर परम्परागत गतिविधियाँ चल रहीं थीं। मैदान में परम्परागत तरीके से लगभग हर धर्म-सम्प्रदाय के हर आयु वर्ग लोग परम्परागत क्रियाकलाप करते हुए परम्परागत रामलीला देखते हुए पुतलों के दहन की प्रतीक्षा में थे।

एक पुतले ने दूसरे से कहा- "मानव ने हमें बनाया, मानव ही हमें जलायेगा, मिटायेगा! हर साल हम बनते और मिटते हैं! हम तो बस पुतले हैं!"

प्रत्युत्तर में दूसरे पुतले ने कहा, "हाँ! अपनी चर्चा सब करते हैं, परन्तु ढाक के तीन पात! ये तो बस कठपुतले हैं!"

[मौलिक व अप्रकाशित]

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 11, 2016 at 5:10am
रचना पर समय देकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद आदरणीय सुरेश कुमार 'कल्याण' जी।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 9, 2016 at 8:03pm
आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी साहब बिल्कुल कठपुतले हैं सभी। हार्दिक बधाई ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 9, 2016 at 4:27pm
मेरी इस ब्लोग पोस्ट पर त्वरित प्रतिक्रिया वव अनुमोदन के साथ ही प्रोत्साहित करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय प्रमोद श्रीवास्तव जी।
Comment by PRAMOD SRIVASTAVA on October 8, 2016 at 11:45pm

सही कहे सबके सब कठपुतले है।

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