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भीतर पुराने धूल-सने मकबरे में

धुआँते, भूलभुलियों-से कमरे

अनुभूत भीषण एकान्त

विद्रोही भाव

जब सूझ नहीं कुछ पड़ता है

कुछ है जो घूमघाम कर बार-बार

नव-आविष्कृत बहाने लिए

अमुक स्थिति को ठेल कर

वहीं का वहीं लौटा लाता है

मकबरे के कमरों में गूँजती

गहन वेदना की पुकार

हज़ारों चिन्ताओं की

नपुंसक इच्छाओं की

पीड़ा के लौटते हुए पैरों की पदचाप

नाखुनों में अब दर्दीली हुई मान्यताओं के

भुरते पलस्तरों की मिट्टी

उन सुनसान दीवारों को नाखुनों से नोच-नोच

कुछ मिला ? ..  क्या मिला ?

मकबरा खड़ा शिलामूर्ति

निज के बाहर कोलतारी हवाएँ

भीतर विवश-वेदना, निराशा, द्वंद्व की साँय-साँय

कमरॊं के नीचे मकबरे के भीतरी तहखानों में

ख्यालों की कोई काली सुरंग हर बार

वहीं का वहीं छोड़ जाती है जहाँ

अनदेखे अनजाने अप्रतिहत

ज़िन्दगी से ऊब कर कितनी सच्चाइयाँ

जीने का एक बहुत बड़ा झूठ बन जाती हैं

--------

-- विजय निकोर 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 932

Comment

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Comment by vijay nikore on November 30, 2016 at 7:36am

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीया राजेश जी। अभी आपकी टिप्पणी संयोगवश ही दिख गई।
आभार में विलम्ब के लिए क्षमा करें... मुझको ओ बी ओ notifications नहीं आ रहीं 


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Comment by rajesh kumari on November 16, 2016 at 1:24pm

आद० विजय निकोर जी बेहद शानदार कविता सृजित हुई आपकी समृद्ध लेखनी से दिल से बधाई लीजिये 

Comment by vijay nikore on October 31, 2016 at 1:58pm

आदरणीय समर कबीर जी, आपने उदार सराहना से मेरा मनोबल बढ़ाया है। आपका हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on October 29, 2016 at 3:03pm

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय गोपाल नारायन जी।

Comment by vijay nikore on October 24, 2016 at 3:45pm

सराहना के लिए आभार, आदरणीय श्याम नारायण जी।

Comment by vijay nikore on October 24, 2016 at 3:17pm

//जीवन के उतार चढ़ाव को बहुत सुन्दर रूप से पिरोया है //

आपका हार्दिक आभार, आदरणीया कल्पना जी।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 23, 2016 at 12:45pm

भीतर विवश-वेदना, निराशा, द्वंद्व की साँय-साँय

कमरॊं के नीचे मकबरे के भीतरी तहखानों में

ख्यालों की कोई काली सुरंग हर बार

वहीं का वहीं छोड़ जाती है जहाँ

अनदेखे अनजाने अप्रतिहत

ज़िन्दगी से ऊब कर कितनी सच्चाइयाँ

जीने का एक बहुत बड़ा झूठ बन जाती हैं--------------बेहतरीन प्रस्तुति . अवसाद के अद्भुत चितेरे हैं आप आ० निकोर जी .

Comment by Samar kabeer on October 20, 2016 at 9:32pm
जनाब विजय निकोर जी आदाब,बहुत ही शानदार रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Shyam Narain Verma on October 20, 2016 at 11:41am
इस सुंदर प्रस्तुति के लिए तहे दिल बधाई सादर
Comment by vijay nikore on October 19, 2016 at 10:56pm

//जीवन और जमाने की यथार्थता को बहुत ही कारीगरी से शब्दों में उकेरा है //

मनोबल बढ़ाने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुरेश जी।

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