For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जनकवि (लघुकथा)

झील ने कवि से पूछा, “तुम भी मेरी तरह अपना स्तर क्यूँ बनाये रखना चाहते हो? मेरी तो मज़बूरी है, मुझे ऊँचाइयों ने कैद कर रखा है इसलिए मैं बह नहीं सकती। तुम्हारी क्या मज़बूरी है?”

कवि को झटका लगा। उसे ऊँचाइयों ने कैद तो नहीं कर रखा था पर उसे ऊँचाइयों की आदत हो गई थी। तभी तो आजकल उसे अपनी कविताओं में ठहरे पानी जैसी बदबू आने लगी थी। कुछ क्षण बाद कवि ने झील से पूछा, “पर अपना स्तर गिराकर नीचे बहने में क्या लाभ है। इससे तो अच्छा है कि यही स्तर बनाये रखा जाय।”

झील बोली, “मेरा निजी लाभ तो कुछ नहीं है। पर मैं नीचे की तरफ बहती तो स्तर भले ही गिर जाता लेकिन मेरा पानी साफ हो जाता और ये इंसानों और जानवरों के बहुत काम आता। इससे धरती के नीचे का जलस्तर भी बढ़ जाता तथा मैं जिस ज़मीन से होकर मैं बहती उसे भी उपजाऊ बना देती।”

कवि बोला, “फिर भी स्तर तो तुम्हारा गिरता ही, बढ़ता तो नहीं न।”

झील मुस्कुराकर बोली, “गिरते गिरते एक दिन सागर तक पहुँचती। सूरज से युद्ध करती और इस युद्ध के कारण उत्पन्न ऊर्जा से भाप बनकर ऊपर उठती तथा बादल बनकर हवाओं की मदद से आसमान को छू लेती । पर मैं तो कैद हूँ, ऐसा नहीं कर सकती। लेकिन सुनो, तुम तो आज़ाद हो न।”

------------

(मौलक एवं अप्रकाशित)

Views: 1017

Facebook

You Might Be Interested In ...

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 27, 2016 at 11:37am

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीया राजेश कुमारी जी।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 27, 2016 at 11:37am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया सीमा जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 23, 2016 at 10:17pm

ऊंचाइयों की गिरफ्त में बंधकर नीचे ना देखना एक आत्ममुग्धता के उन्माद में जीना ये सबसे बड़ा अवगुण है लेखक या कवि का मैं उसे माँ शारदा का सच्चा/सफल  भक्त नहीं कह सकती आपने बिम्बात्मक शैली में ऐसे लोगों पर जबरदस्त कटाक्ष किया है बहुत बहुत बधाई आपको आद० धर्मेन्द्र जी 

Comment by Seema Singh on October 23, 2016 at 3:11pm
बहुत सुंदर ढंग से बात कही है आपने, ये ऊंचाइयों की आदत होना ही तो बहुत खतरनाक है साहित्य के लिये भी और समाज के लिए भी। सरलता के साथ सन्देश देती कथा पर ह्रदय से शुभकामनाएं आ० धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 22, 2016 at 4:41pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय कल्पना भट्ट जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 22, 2016 at 4:41pm

इस विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए हृदय से धन्यवाद आदणीय रवि प्रभाकर साहब। आप सच कह रहे हैं लघुकथा गद्यगीत हो तो अत्यंत प्रभावशाली होती है। आपको मेरा प्रयास अच्छा लगा इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 22, 2016 at 4:39pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय उस्मानी साहब।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 22, 2016 at 4:39pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय शिज्जू जी

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 22, 2016 at 11:26am
वाह । अद्भुत लेखन हुआ है आदरणीय । बहुत बहुत बधाई ।
Comment by Ravi Prabhakar on October 22, 2016 at 8:06am

लघुकथा के स्‍तंभ माने जाने वाले स्‍व्. श्री शंकर पुण्‍तांबेकर जी लघुकथा को एक गद्यगीत मानते थे। आ. धर्मेन्‍द्र भाई आपकी लघुकथा पठन के दौरान मैनें पाया कि वो ऐसा क्‍याें मानते थे। लघुकथा में एक रवानगी है जो पाठक को अपने साथ बहा ले जाने में समर्थ है। सुन्‍दर वाक्‍य विन्‍यासों से सजी, अर्थपूर्ण लघुकथा बीच-बीच में उपदेशात्‍मक होने का आभास देती है पर अंत तक आते आते इसका सौदंर्य देखते ही बनता है। लघुकथा का शीर्षक बहुत ही उत्‍तम है। 'जनकवि' शीर्षक के माध्‍यम से आपने कथित बुद्धिजीवी कवियों पर अत्‍यंत तीक्ष्‍ण कटाक्ष किया है जो अपने लेखन से जनमानस की बात न कर ऊंची ऊंची हांकते रहते है। मैं आपको इस लघुकथा हेतु ह्दय से शुभकामनाएं भेंट करता हूं। सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे -रिश्ता
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी रिश्तों पर आधारित आपकी दोहावली बहुत सुंदर और सार्थक बन पड़ी है ।हार्दिक बधाई…"
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"तू ही वो वज़ह है (लघुकथा): "हैलो, अस्सलामुअलैकुम। ई़द मुबारक़। कैसी रही ई़द?" बड़े ने…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"गोष्ठी का आग़ाज़ बेहतरीन मार्मिक लघुकथा से करने हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह…"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आपका हार्दिक आभार भाई लक्ष्मण धामी जी।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"ध्वनि लोग उसे  पूजते।चढ़ावे लाते।वह बस आशीष देता।चढ़ावे स्पर्श कर  इशारे करता।जींस,असबाब…"
Sunday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"स्वागतम"
Mar 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Mar 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Mar 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Mar 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Mar 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
Mar 29

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service