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क्षण भर पीर को सोने दो .....

क्षण भर पीर को सोने दो .....

क्षण भर  पीर को सोने  दो
चाह को  मुखरित  होने दो
जाने चमके फिर कब चाँद
अधर को अधर का होने दो

क्षण भर पीर को सोने दो .....

आलौकिक वो मुख आकर्षण
मौन भावों का प्रणय समर्पण
अंतस्तल  को  तृप्त तृषा  का
वो छुअन अभिनंदन होने दो

क्षण भर पीर को सोने दो .....

बीत न जाए शीत विभावरी
विभावरी तो विभा से  हारी
अंग अंग  को प्रीत गंध का
अनुपम  उपवन  होने  दो

क्षण भर पीर को सोने  दो .....

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on December 6, 2016 at 4:10pm

आदरणीय   सुनील प्रसाद(शाहाबादी)   जी प्रस्तुति आपके आत्मीय आशीर्वाद से उपकृत हुई। हार्दिक हार्दिक आभार।  पिछले ६-७ दिनों से नेट काम नहीं कर रहा था सो आभार व्यक्त करने में विलम्ब हुआ। इस हेतु क्षमा प्रार्थी हूँ। 

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on December 5, 2016 at 10:27pm
नमन आदरणीय सुशिल सरना जी सुंदर भावपूर्ण सृजन आपकी लेखनी से आई है बधाई है आपको।
Comment by Sushil Sarna on December 2, 2016 at 5:20pm

आदरणीय  vijay nikore साहिब प्रस्तुति के भावों को अपनी प्रशंसा से अलंकृत करने के लिए हार्दिक आभार

Comment by vijay nikore on December 2, 2016 at 3:39pm

 सदैव समान आपने एक और सुन्दर रचना लिखी है। हार्दिक बधाई।

Comment by Sushil Sarna on November 30, 2016 at 7:07pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति के भावों को अपनी अनुपम प्रशंसा से अलंकृत करने के लिए हार्दिक आभार। बाकी रही पीर की बात तो वो तो क्षण भर के लिए ही उसे सुलाना या भुलाना है ताकि प्रेम भाव मुखरित हो सके। वैसे आपका कथन अपने स्थान पर सही है कि पीर तो मिटने के बाद ही मिटती है। आपकी इस सूक्षम समीक्षात्मक प्रशंसा का शुक्रिया। 

Comment by Samar kabeer on November 30, 2016 at 5:14pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छे भाव पिरोये हैं आपने इस कविता में,लेकिन पीर तो तभी सोती है जब हम हमेशा के लिये सो जाते हैं ।
इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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