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अधूरी तिश्नगी ...

अधूरी तिश्नगी ...

कैसे भूल सकती हूँ
वो रात
वो बात
जो एक चिंगारी से
शुरू हुई थी

वो चिंगारी
मेरी रगों में
धीरे धीरे
आग बनकर फैलती गयी
और मैं
चुपचाप उस आग में
जलती रही

मैं
खामोशियों के बियाबाँ में
गूंगी बनी
अपने जज़्बातों से
तन्हा सी
गुफ़्तगू करती रही

अपने खून में
लगी आग को बुझाना
मुझे कहां आता था
निहारती रही
आसमां की तरफ़
कि शायद कोई अब्र
मुझ पर रहम खायेगा
मेरी आग को बुझा जाएगा

मगर
सहरा से तन्हा लम्हों में
मैं
मेरी रात
वो चिंगारी बनी बात
बेबस दिए की

लौ की मानिंद
हर करवट
अधूरी तिश्नगी लिए
बस जलते रहे
पिघलते रहे

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on December 13, 2016 at 5:11pm

आदरणीय  Mahendra Kumar जी प्रस्तुति को अपनी आत्मीय प्रशंसा से अलंकृत करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 13, 2016 at 5:11pm

आदरणीय  Tasdiq Ahmed Khan जी प्रस्तुति को अपनी आत्मीय सराहना से शोभित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Mahendra Kumar on December 12, 2016 at 9:05pm
बहुत बढ़िया कविता है आदरणीय सुशील सरना जी। हार्दिक बधाई। सादर।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 12, 2016 at 8:48pm

जनाब सुशील सरना साहिब , एक खामोश औरत के जज़्बात की अच्छी मंज़र कशी हुई है रचना में , मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं --

Comment by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 7:32pm

आदरणीय डॉ  गोपाल जी भाई साहिब  प्रस्तुति को अपनी मधुर शब्दों से अलंकृत करने का हार्दिक आभार। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 12, 2016 at 5:53pm

वाह वाह सरना जी , ऐसी तिश्नगी आप में ही हो सकती है , सादर .

Comment by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 1:39pm

आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'  जी प्रस्तुति के भावों को स्वीकृति देती आपकी आत्मीय प्रशंसा से रचना उपकृत हुई। .....आपका हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 1:35pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति के भावों की अपने शीरीं लफ़्ज़ों से ताजपोशी करने का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by नाथ सोनांचली on December 12, 2016 at 11:02am
आदरणीय सुशील सरना जी सादर अभिवादन, बहुत बढ़िया, भावपूर्ण और एक अतुकांत रचना की पृष्ठभूमि में प्रतिबिम्ब खिचती खुबसूरत रचना पर मेरी अन्तश ह्रदय से बधाई आपको, सादर
Comment by Samar kabeer on December 12, 2016 at 10:49am
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी,एक बाहया औरत के जज़्बात की बहुत बढ़िया तर्जुमानी की है आपने,इस शानदार प्रस्तुति पर दिल से देरों बधाई स्वीकार करें ।

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