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निशानों में .....

आंखें बन्द
मुट्ठियों भिची हुई
अंतस में शोर
अपने रुद्र रूप में
तलाश
बीते लम्हों की
खो गए जो
अपने साथ लिए
जन्मों के वादे
सागर किनारे
गीली रेत पे
छूटे
गीले पाँव के
निशानों में

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 465

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Comment by Sushil Sarna on December 13, 2016 at 5:09pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी प्रस्तुति को अपनी आत्मीय सराहना से शोभित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 13, 2016 at 5:08pm

आदरणीय Mahendra Kumar जी अपने प्रस्तुति पर आपकी मधुर प्रशंसा से रचना उपकृत हुई। ... हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 13, 2016 at 5:07pm

आदरणीय तस्दीक़ अहमद साहिब अपने बेशकीमती अल्फ़ाज़ों से प्रस्तुति का मान बढ़ाने का दिल से शुक्रिया। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 13, 2016 at 12:31am

आदरणीय सुशील सरना सर, बहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति हुई है. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 

Comment by Mahendra Kumar on December 12, 2016 at 9:38pm
आदरणीय सुशील सरना जी, बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने। मेरी तरफ से ढेरों बधाई। सादर।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 12, 2016 at 8:28pm

जनाब सुशील सरना साहिब , बहुत ही सुन्दर और जज़्बाती रचना हुई है , दिल से मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं --

Comment by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 7:30pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति को अपनी आत्मीय प्रशंसा से मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Samar kabeer on December 12, 2016 at 5:02pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,उम्दा और दमदार रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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