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गीत(रोला छ्न्द)/सतविन्द्र कुमार राणा

गीत (रोला छ्न्द)
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सबपर उसका नेह,प्रकृति प्यारी है माता
खिलता हरसिंगार,रात में सुन ले भ्राता।

पँखुड़ी निर्मल श्वेत,मोह सबका मन लेती
सुंदरता है नेक,नयन को यह सुख देती
केसरिया है दंड,रंग जिसका चमकीला
हुआ मुग्ध मन देख,प्रकृति की ऐसी लीला
पुलकित होकर आज ,हृदय इसके के गुण गाता
खिलता हरसिंगार रात में सुन ले भ्राता।

देखो ज्यों ही तात, प्रात की बेला आए
अवनी पर तब पुष्प,सभी जाते छितराए
सुन्दर हरसिंगार,उठालो इनको चुनकर
बनते लेप अनेक,बड़े ही इनसे गुनकर
होता उनसे लेप,रूप को जो निखराता
खिलता हरसिंगार, रात में सुन ले भ्राता।

औषध का भी काम,करे यह पुष्प अनोखा
ज्वर को करता ठीक,नहीं देता यह धोखा
ठंडा रहे दिमाग,शक्ति अच्छी मिल जाती
गर्मी हो तो ठंड,हमें इससे मिल पाती
इसका सेवन ठीक,रोग कितने कर जाता
खिलता हरसिंगार,रात में सुन ले भ्राता।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 15, 2016 at 5:00pm
श्रद्धेय सौरभ पांडेय जी सादर नमन!प्रयास पर उपस्थित होकर प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल आभार।नवगीत विधा को सही से समझने के लिए अब जिज्ञासा बढ़ गई है।अब इस विधा की सभी बारीकियों को समझने की चेष्टा होगी।आपके इस मार्गदर्शन के लिए भी अतिशय आभार।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 15, 2016 at 4:57pm
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी,प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार भाई जी!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 15, 2016 at 4:56pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी छंदों को पसन्द कर स्नेहिल प्रोत्साहत देने के लिए दिल से आभार।यह स्नेह यूँ ही बना रहे।सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 6, 2016 at 8:13am

इस प्रस्तुति को नवगीत की संज्ञा न दें, आदरणीय. प्रस्तुति साहित्यिक गेय रचना की श्रेणी की ही है. इसे साहित्यिक गीत कह सकते हैं. नवगीत अपने कथ्य और इंगितों के कारण एक विशिष्ट विधा है.

आपकी प्रस्तुति अवश्य पठनीय हुई है. छन्द के विधान पर आपकी आनुशासनिक पकड़ और प्रकृति-पुष्प हरसिंगार का सुन्दर शाब्दिक वर्णन बरबस ध्यान खींचते हैं और आपके साहित्यिक प्रयासों पर पाठकों से भूरि-भूरि प्रशंसा बटोर लेने का माद्दा रखते हैं. 

आपकी इस रचना केलिए हृदयतल से बधाई.

Comment by vijay nikore on December 6, 2016 at 7:34am

छ्न्द अच्छा है। बधाई।

Comment by नाथ सोनांचली on December 6, 2016 at 3:49am
आद0 भाई सतविन्द्र जी सादर अभिवादन। रोला छंद की शानदार प्रस्त्तुती के लिए कोटिश बधाई। बेहतरीन रोला छंद बना है मित्र
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 5, 2016 at 3:15pm

छंद बंधन एतु बधाई ,, आदरनीय 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 4, 2016 at 11:08pm
आदरणीय गिरिराज जी सादर नमन!अनुमोदन कर स्नेहिल प्रोत्साहन के लिए आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 4, 2016 at 9:39pm

आदरनीय सतविन्द्र भाई , हरशृंगार पर बहुत जानदार रोला गीत रचा अहि आपने , हार्दिक बधाई आपको ।

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