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ओ मेरे आकाश !

पिता थे तुम

असीम अपरिमाप

सितारों की पहुँच से भी दूर

और मैं पर्वत की भाँति बौना

अपने उठान का अभिमान लिए

तब नहीं जानता था

यह फर्क

जब तुम मेरे पास थे

अनंत विस्तार लिए

भले ही

आज बन जाऊं मैं ऊंचा

चोमोलुंगमा

यानि कि सागरमाथा

दुनियां का सर्वोच्च हिमशिखर

एवरेस्ट ---

 

ओ मेरे आकाश !

 सदा ही रहोगे तुम

अनंत ऊँचाइयों पर

ऊंचे और उन्नत

कई-कई एवरेस्ट

शिखरों से ऊपर

और तना रहेगा तुम्हारा

श्यामल आच्छादन

ठीक सबके सिर पर

किसी अज्ञात

आशीर्वाद के प्रति उठे

एक प्रशस्त हाथ की तरह

 

ओ मेरे आकाश !

 क्यों हो मेरी पहुँच से  

तुम इतनी दूर ?

क्यों नहीं पहुँचते वहां तक

अब मेरे हाथ ?

जो कभी थामते थे

तुम्हारी उंगली

क्यों झिटक दिया तुमने मुझे

मेरी उन बौनी बांहों को ?

क्यों हो गए तुम

सिर्फ एक झटके से

मायावी अंत से

सत्वर अनंत ?

 

ओ मेरे आकाश !

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 6, 2016 at 5:45pm

आ० वामनकर जी , आपका स्नेह पाकर आश्वस्त हूँ सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 6, 2016 at 5:43pm

आ० विजय निकोर जी , आपकी भावपूर्ण टिप्पणी से अभिभूत हूँ . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 6, 2016 at 5:42pm

-आ० मिर्जा हफीज बेग साहिब , बहुत बहुत शुक्रिया .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 6, 2016 at 5:40pm

आ० सुनील प्रसाद जी , अभिभूत हुआ .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 6, 2016 at 5:39pm

आदरने समर कबीर साहिब , आपका शत शत आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 6, 2016 at 3:07pm

आदरणीय गोपाल सर, दिल को छूती प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई सादर 

Comment by vijay nikore on December 6, 2016 at 7:54am

पिता का स्थान मेरे जीवन में कितना महान था, यह आपकी हृदयस्पर्शी रचना मेरी पलकों को भिगो कर याद दिला गई। ३६ वर्ष हुए जब मैंने उन पर घी और सन्दल की आहुति दी थी, और मुझको लगा कि मैं केवल वहाँ तक ही उनको अपने पास रख सकता था । आपने यह क्या कविता लिखी सारा दृश्य वापस लौट आया। आपको किन शब्दों से बधाई दूँ, आदरणीय भाई गोपाल नारायन जी ! बहुत ही सुन्दर रचना है।

Comment by Mirza Hafiz Baig on December 5, 2016 at 10:15pm

आदरणीय डॉ, गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, धन्यवाद । दिल को छू लिया । पिता की कमी पता नही किस उम्र तक खलती रहती है ।

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on December 5, 2016 at 10:13pm
सुंदर भावपूर्ण सृजन बधाई है आपको।
Comment by Samar kabeer on December 5, 2016 at 8:20pm
जनाब डॉ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आदाब,जब कोई हमसे दूर चला जाता है तब हमें अहसास होता है कि हमने क्या खो दिया है,और फिर पिता का साया तो वाक़ई आकाश की तरह ही होता है,बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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