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ग़ज़ल वो सुर्खरूं चेहरे पे कुछ आवारगी पढ़ने लगी

2212 2212 2212 2212

शर्मो हया के साथ कुछ दीवानगी पढ़ने लगी।
वो सुर्खरूं चेहरे पे कुछ आवारगी पढ़ने लगी ।।

हर हर्फ़ का मतलब निकाला जा रहा खत में यहां ।
खत के लिफाफा पर वो दिल की बानगी पढ़ने लगी ।।

वह बेसबब रातों में आना और वो पायल की धुन ।
शायद गुजरती रात की वह तीरगी पढ़ने लगी ।।

गोया के वो महफ़िल में आई बाद मुद्दत के मगर ।
ये क्या हुआ उसको जो मेरी सादगी पढ़ने लगी ।।

कुछ हसरतों को दफ़्न कर देने पे ये तोहफा मिला ।
वो फिर तबस्सुम को लिए मर्दानगी पढ़ने लगी ।।

बहकी अदा तो वस्ल के अंजाम तक लाई उसे ।
पैकर पे आकर फिर नज़र शर्मिंदगी पढ़ने लगी ।।

नज़दीकियों के बीच में पर्दा न कोई रह गया ।
मेरी जलालत में मेरी बेपर्दगी पढ़ने लगी ।।

सहमी हुई थी आँख वो सहमा मिला था दिल तेरा ।
कुछ हिज्र पर गमगीन था नाराजगी पढ़ने लगी ।।

खामोशियाँ थीं लफ्ज पर जज्बात फिर भी थे जवाँ ।
नज़रों से निकली हुस्न की वो बन्दगी पढ़ने लगी ।।

ये आधियों का जुर्म , पर झंडा वहीँ कायम रहा ।
अब वो हमारे इश्क़ की हर तिश्नगी पढ़ने लगी ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on December 21, 2016 at 11:38pm
बृजेश कुमार ब्रज साहब सादर आभार
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 21, 2016 at 7:31pm
बहुत खूबसूरत...बधाइयाँ
Comment by Naveen Mani Tripathi on December 21, 2016 at 2:11pm
आ0 महेंद्र कुमार साहब सादर आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on December 21, 2016 at 2:07pm
आ0 मिथिलेश वामनकर साहब तहेदिल से शुक्रिया ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on December 21, 2016 at 2:06pm
आ0 गुरु जी कबीर साहब सादर नमन के साथ आभार ।
Comment by Mahendra Kumar on December 21, 2016 at 11:49am
अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय नवीन जी। मेरी तरफ से ढेर सारी बधाई। सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 21, 2016 at 12:19am

 आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी,बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने, शेर-दर-शेर दाद ओ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं. सादर 

Comment by Samar kabeer on December 20, 2016 at 5:08pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
मतले के सानी मिसरे में 'सुर्ख़रुं' को " सुर्ख़रु" कर लें ।

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