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कह्र ...

थक गयी है
लबों पे हंसी
शायद लब
आडम्बर का ये बोझ
और न सहन कर पाएंगे
संग अंधेरों के
ये भी चुप हो जाएंगे
कफ़स में कहकहों के
दर्द बेवफाई का
ये छुपा न पाएंगे
बावज़ूद
लाख कोशिशों के
ये
गुज़रे हुए
लम्हों की आतिश से
बंद पलकों से
पिघल कर
तकिये को
गीला कर जाएंगे
सहर की पहली शरर पे
रिस्ते ज़ख्मों का
कह्र लिख जाएंगे


सुशील सरना

मौलिक एवम अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on January 18, 2017 at 6:00pm

आदरणीय राजेश कुमारी जी प्रस्तुति के भावों को अपने स्नेहिल शब्दों से मान देने का हार्दिक आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 18, 2017 at 12:27pm

आद० सुशील सरना जी ,बहुत सुंदर कविता.. क्या मुझे तो ये नज्म की तरह लगी बहुत खूबसूरत ..बहुत बहुत बधाई 

Comment by Sushil Sarna on December 30, 2016 at 2:57pm

आ. मिथिलेश वामनकर जी प्रस्तुति को अपनी स्नेहिल प्रशंसा से अलंकृत करने का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on December 30, 2016 at 2:57pm

आ.  Mahendra Kumar जी प्रस्तुति के भावों को अपना आत्मीय सम्मान देने का दिल से शुक्रिया।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 29, 2016 at 11:59pm

आदरणीय सुशील सरना सर, बहुत बढ़िया प्रस्तुति. हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by Mahendra Kumar on December 29, 2016 at 8:00pm
बंद पलकों से
पिघल कर
तकिये को
गीला कर जाएंगे
सहर की पहली शरर पे
रिस्ते ज़ख्मों का
कह्र लिख जाएंगे ...वाह! बहुत ही बढ़िया कविता लिखी है आपने आदरणीय सुशील सरना जी। आपको बहुत-बहुत बधाई। सादर।
Comment by Sushil Sarna on December 29, 2016 at 3:12pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप जी  प्रस्त्तुति के भावों को सम्मानित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 29, 2016 at 3:10pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्त्तुति को अपने आत्मीय स्नेह से  अलंकृत  करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 29, 2016 at 3:09pm

आदरणीय डॉ गोपाल  जी  भाई साहिब प्रस्त्तुति को अपने स्नेहाशीष से पल्लवित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 29, 2016 at 3:06pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी प्रस्तुति के भावों को अपना आत्मीय स्नेह  देने का हार्दिक आभार। 

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