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अपनों से  ... 

सपने
अक्सर
तारों की तरह
गिरकर
टूट जाते हैं

चीख उठते हैं
आँखों में
ख़ामोश आंसू
जब
अपने
अपनों से
रूठ जाते हैं

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 461

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Comment by Sushil Sarna on January 2, 2017 at 7:20pm

आदरणीय   Samar kabeer   जी प्रस्तुति को स्नेहिल शब्दों से मान देने का हार्दिक आभार। नव वर्ष को आपको सपरिवार मंगलमय हो। 

Comment by Sushil Sarna on January 2, 2017 at 7:20pm

आदरणीय   Mahendra Kumar   जी प्रस्तुति को स्नेहिल शब्दों से मान देने का हार्दिक आभार। नव वर्ष को आपको सपरिवार मंगलमय हो। 

Comment by Samar kabeer on January 2, 2017 at 5:39pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी जज़्बाती कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mahendra Kumar on January 2, 2017 at 3:01pm
आदरणीय सुशील सरना जी, अच्छी रचना है। मेरी तरफ से हार्दिक बधाई। सादर।
Comment by Sushil Sarna on December 30, 2016 at 2:58pm

आ. मिथिलेश वामनकर जी प्रस्तुति को अपनी स्नेहिल प्रशंसा से अलंकृत करने का हार्दिक आभार।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 30, 2016 at 12:25am

आदरणीय सुशील सरना सर, बढ़िया भावाभिव्यक्ति हुई है. हार्दिक बधाई.

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