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कलम स्याह आँसू न यूँ ही बहाये-पंकज की ग़ज़ल

122 122 122 122

प्रिये हमनें तुमको ये हक़ दे दिया है
चले आना बेवक्त भी घर खुला है

तुम्हें देख चेहरे पे रौनक हुई तो
न समझो यही हाल पहले रहा है

धुँआ रौशनी ये अचानक नहीं सब
किसी घाट पर कोई आशिक़ जला है

कलम स्याह आँसू न यूँ ही बहाये
वियोगी कोई आज फिर लिख रहा है

उन्होंने तो इसको दिया ग़म का सागर
अलग बात उसमें भी पंकज खिला है


मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 7, 2017 at 11:03pm
आदरणीय मिथिलेश सर सादर अभिवादन और कमी की तरफ ध्यान आकृष्ट करने हेतु सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 7, 2017 at 11:02pm
आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम, सुझाव के अनुरूप संशोधन कर लिया है
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 7, 2017 at 11:01pm
आदरणीय ब्रज जी सादर आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 7, 2017 at 2:51pm

आदरणीय पंकज जी, ग़ज़ल का बढ़िया प्रयास हुआ है. हार्दिक बधाई. काफियाबंदी पर पुनर्विचार निवेदित है. सादर 

Comment by Samar kabeer on January 7, 2017 at 2:51pm
अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
आपकी ग़ज़ल के क़ाफिये अलिफ़ के हैं,लेकिन मतले के दोनों मिसरों में'ला'की क़ैद से ईता का दोष आ रहा है,देखियेगा ।
"तुम्हें देख चहरे पे रौनक़ हुई तो
न समझो की बीमार बहतर हुआ है"
इस शैर का ख़याल ग़ालिब के शैर से इस्तीफादा है,
"उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है"
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 7, 2017 at 9:55am
बहुत खूब बहुत खूब

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