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दूधिया चादर में लिपटी वादियाँ (वादियों की एक दिलकश सुबह ग़ज़ल "राज")

2122   2122  212

सुन हवाओं की जवाँ सरगोशियाँ

दूधिया चादर में लिपटी वादियाँ

 

देख  भँवरे   की नजर  में शोखियाँ  

चुपके  चुपके हँस रही थीं  तितलियाँ

 

 नींद में सोये  कँवल भी जग उठे     

गुफ्तगू जब कर रही थी किश्तियाँ

 

 छटपटाती कैद में थी  चाँदनी

हुस्न को ढाँपे हुए थी बदलियाँ

 

मुट्ठियों में भींच के सिन्दूर को

मुन्तज़िर खुर्शीद की थी रश्मियाँ  

 

फिक्र-ए-शाइर पे भी छाया नूर सा

देख कातिल हुस्न की ये मस्तियाँ

 

चाहती है कौन बंधन जाल का 

मशविरा ये कर रही थी मछलियाँ

 

घोंसले  में जिन्दगी महफूज़ थी
शाख़ ने थामी हुई थी बिजलियाँ

 

हो गई कलियाँ शहाबी इश्क में

राज खोलें सब लबों की सुर्खियाँ 

---------मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 16, 2017 at 2:36pm

आद० सुरेन्द्र नाथ सिंह भैय्या  ,आपका तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 16, 2017 at 11:40am

आद० समर भाई जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका बहुत बहुत शुक्रिया .हमेशा की भांति आपक मार्ग दर्शन मिला .दरअसल गुपचुप शब्द सरगोशियाँ से संबंधित न होकर वादियों से संबंधित है ---वादियों ने गुपचुप इश्क की सरगोशियाँ सुनी .फिर भी यदि भ्रमात्मक स्थिति है तो इस मिसरे को ही बदल रही हूँ .कुछ संशोधन के साथ पुनः ग़ज़ल प्रतिस्थापित करवाती हूँ पुनः अपने नेक मशविरे  से लाभान्वित करें .

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 16, 2017 at 11:35am

आद० ब्रिजेश कुमार बृज जी ,आपका बहुत बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 16, 2017 at 11:34am

आद० मुहम्मद आरिफ़ जी ,तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ आपको ग़ज़ल पसंद आई .

Comment by नाथ सोनांचली on January 16, 2017 at 8:18am
बहन आद0 राजेश कुमारी जी सादर अभिवादन, उम्दा गजल के लिए दाद के साथ मुबारकबाद कबूल फरमाएँ। शेष समर साहब ने बात कह ही दी है, जिससे न सिर्फ आपको, अपितु हम जैसे नये लिखने वालों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है। सादर
Comment by Samar kabeer on January 15, 2017 at 9:50pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले का ऊला मिसरा कमज़ोर है,'गुप् चुप'को ही सरगोशियाँ कहते हैं,आपका ये मिसरा इस तरह कहा जा सकता है:-
'सुनके देखो इश्क़ की सरगोशियाँ'
'थीं निगाहों में ग़ज़ब की शोखियां
गुफ़्तुगू जब कर रही थीं कश्तियां'
हुस्न-ए-मतला भी कमजोर है,एक तो ये कि ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है ' कर रही',इसे भी नज़र अंदाज़ कर दें तो,ऊला मिसरे में निगाहों में ग़ज़ब की शोखियों का ज़िक्र है और सानी मिसरे में 'कश्तियाँ'है, यहाँ उसूलन क़ाफ़िया ऐसा रखना होगा जिससे निगाहों का तालमेल बैठ सके,मेरा नाचीज़ मश्विरा है कि यहाँ 'किश्तियाँ'की जगह "तितलियाँ"क़ाफ़िया बहतर काम करेगा ।
तीसरे शैर के सानी में 'थी'को "थीं"कर लें ।
पांचवें शैर में "सुर्ख़रु"शब्द का आपने क्या अर्थ लिया है ?
आख़री शैर का ऊला मिसरा भी कमज़ोर है:-
'घोंसलों में जिंन्दगी महफ़ूज़ थीं'
यहाँ 'ज़िन्दगी'एक वचन है, और 'थीं'बहुवचन,देखियेगा ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 15, 2017 at 5:16pm
वाह आदरणीया सुन्दर ग़ज़ल हुई हार्दिक बधाई
Comment by Mohammed Arif on January 15, 2017 at 4:48pm
आदरणीया राजेश कुमारीजी, आदाब! अच्छी ग़ज़ल के लिए ढेरों मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएँ ।

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