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झिलमिल तारों सा सपनो के अम्बर में रहते हो क्यों ?

मलयानिल की मधु धारा सा मानस में बहते हो क्यों?

 

रेशम सी शर्मीली आँखे गाथा कहती है मन की

निर्ममता के अभिनय क्षण में अंतर्गत चहते हो क्यों?

 

अंतस में भावों की गंगा यदि पावन है पूजा सी

तो संकल्पों की वर्षा हो फिर पीड़ा सहते हो क्यों?

 

वृन्दावन की वीथी में तुमने ही झिटकी थी बाहें

फिर उन बाँहों को मंदिर की शाला में गहते हो क्यों?

 

प्राणों का रसमय बंधन वह तुमने ठुकराकर तोड़ा  

विरहा की पावक लपटों में अब बेबश दहते हो क्यों?

 

आहों के सरगम पर जीवन जाने है कितने बीते   

तब फिर तुम तटिनी के तट सा राका में ढहते हो क्यों?

 

युग की निष्ठुरता का बाना धारण यदि कर ही डाला

तो सबसे उस मधुचर्या की मृदु बातें कहते हो क्यों ? 

 (मौलिक/अप्रकाशित)

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 24, 2017 at 9:07pm

आदरनीय बड़े भाई गोपाल जी , बहरे मीर पर सरस और सुन्दर ग़ज़ल कही है , प्रवाह भी खूब है ! हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें । जो बातें कहनी थीं वो आ, समर भाई जी कह ही चुके हैं , ख्याल कीजियेगा ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 24, 2017 at 8:21pm

आ० कुशक्षत्रप जी , अनुग्रहीत हुआ

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 24, 2017 at 8:20pm

आ० रवि शुक्ला जी , सादर आभार .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 24, 2017 at 8:19pm

आ०  आरिफ जी , बहुत शुक्रिया

Comment by नाथ सोनांचली on January 23, 2017 at 2:45pm
आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन, बहरे मीर पर बहुत खूबसूरत और उम्दा गजल कही आपने, बधाई निवेदित है।
Comment by Ravi Shukla on January 23, 2017 at 1:46pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण जी  बहुत ही सुन्‍दर भाव पूर्ण रचना प्रस्‍तुत की आपने  कितने ही प्रश्‍नो के प्रेेमपूर्ण उपालंभ दे डाले आपने बहुत खूब । बधाई स्‍वीकार करें   

Comment by Mohammed Arif on January 22, 2017 at 8:33pm
आदरणीय गोपाल नारायणजी, उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2017 at 9:18pm

आ० आशुतोष जी . आपकी जर्रानवाजी का शुक्रिया .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2017 at 9:17pm

आओ वर्मा जी . सादर  स्नेह .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2017 at 9:17pm

आओ वर्मा जी . सादर  स्नेह .

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