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रेत पर कोई हुनर होने को है (ग़ज़ल)

2122 2122 212

उसका हमला रात भर होने को है
कब तलक जागूँ? सहर होने को है

भीड़ सारी उस तरफ जुटने लगी
मोजिज़ा कोई जिधर होने को है

लौ चिराग़ों की हवा ने तेज़ की
ख़ाक लेकिन मेरा घर होने को है

मिल गया इक ख़ूबसूरत हमसफ़र
अब तो सहरा भी डगर होने को है

आधुनिकता के नशे में डूब कर
हर बशर अब जानवर होने को है

लहलहाने को है फ़स्ल अश्क़ों की "जय"
रेत पर कोई हुनर होने को है

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 26, 2017 at 8:02pm

आदरणीय जय नित भाई , गज़ल भी खूबसूरत कही है आपने और आ. समर भाई जी ने इस्लाह भी बहुत बढिया कर दी है , मेरे खयाल से और कुछ सोचने के लिये नही रह जाता ।

मोजिज़ा के अर्थ को  बारीकी से समजह्ने के लिये आपको मेरी गज़ल जो अभी लिस्ट मे है एक बार देख लेनी चाहिये , मैने भी मोज़िजा का उपयोग किया था , जिसे बदल दिया !

गज़ल के लिये आपको  हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 25, 2017 at 1:30pm

आदरणीय जय्नित जी ..शानदार ग़ज़ल हुयी है आधुनिकता के नशे में डूब कर
हर बशर अब जानवर होने को है

लहलहाने को है फ़स्ल अश्क़ों की "जय"
रेत पर कोई हुनर होने को है  इन दोनों शेरो के लिए बिशेस रूप से बधाई स्वीकार करें सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 25, 2017 at 12:37am

आदरणीय जयनित जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. बधाई. आदरणीय समर कबीर जी की इस्लाह को मिसरों की तार्किकता के आधार पर विचार कीजियेगा. सादर  

Comment by Samar kabeer on January 24, 2017 at 8:57pm
शुक्रिया भाई ।
Comment by munish tanha on January 24, 2017 at 6:06pm

आदरणीय समर साहिब  आपका सुझाव सभी के काम आएगा ..धन्यवाद जो आपने सटीक टिप्पणी की....

 

Comment by Samar kabeer on January 24, 2017 at 2:18pm
जनाब गुरप्रीत सिंह जी आदाब,जी,मैं तो मंच का सेवक हूँ,जो कुछ भी थोड़ा बहुत आता है,साझा कर लेता हूँ भाई ।
Comment by Gurpreet Singh jammu on January 24, 2017 at 12:58pm

आदरणीय समर कबीर जी. बहुत शुक्रिया आपके तुजुर्बे से हम सब को फायदा मिल रहा है... यूँ ही हमारा मार्ग दर्शन करते रहें

Comment by Samar kabeer on January 23, 2017 at 10:33pm
भाई जयनित जी,आपका ये मिसरा भी मतले को ताक़त नहीं दे रहा है,और ये इसलिये कि ग़ज़ल की रदीफ़ 'होने को है'को दोनों मिसरों में बंधना बहुत दुश्वार अमल है, इसके लिये आपको एक सुझाव दे रहा हूँ,वैसे आपकी प्रतिक्रया ये बता रही है कि आप अपनी गलती का ख़ुद सुधार करना चाहते हैं,और ये बहुत अच्छी बात है,फिर भी मेरे सुझाये हुए मिसरे से आपको इसकी तरकीब समझ आ जायेगी कि मतला कैसे कहना है :-

"आई है ऐसी ख़बर होने को है
उसका हमला रात भर होने को है"

दूसरे शैर में आपका स्पष्टीकरण दमदार नहीं,'लेकिन'शब्द निकालना ज़रूरी है ।

मतले के बाद वाले शैर में,आपने 'मौजिज़ा'शब्द लिया है,और 'मौजिज़ा',करिश्मा,चमत्कार,अचानक होते हैं,तयशुदा नहीं होते ।

मक़्ते में भला आपके अश्कों की फ़स्ल से रेत पर करिश्मा क्यों होगा भाई ?ये कौनसा अनोखा काम है ?
Comment by जयनित कुमार मेहता on January 23, 2017 at 3:49pm
आदरणीय समर कबीर जी, आपकी यही सहजता और सरलता आपके बड़प्पन को दर्शाती है। आप (आपलोग) जिस निःस्वार्थ भाव से समर्पित होकर हम लोगों का निरंतर मार्गदर्शन करते हैं, वह ओबीओ के अतिरिक्त किसी अन्य मंच पर दिखना दुर्लभ है। इसके लिए मैं और ओबीओ के समस्त सीखने के इच्छुक और जिज्ञासु सदस्य आपके ऋणी रहेंगे।
अब बात इस ग़ज़ल के सन्दर्भ में-

आपके इस्लाह के बाद मुझे महसूस हुआ कि वाक़ई मतले में कथ्य गड़बड़ हो रहा है। अगर सानी मिसरा यूं कहूँ तो ठीक होगा?
"जागे-जागे फिर सहर होने को है" कृपया अपनी राय दीजियेगा।

मतले के बाद वाले शेर में मेरा संकेत उस बात की तरफ है, जैसे किसी जगह पर कोई जादू, करिश्मा, चमत्कार इत्यादि दिखाने के लिए पहले लोग इकट्ठे किये जाते हैं।

फिर, दूसरे शेर में मैं एक ही घटना के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर चिंतित हूँ। लौ बढ़ने से रौशनी तो बढ़ी, ठीक है। 'लेकिन' इससे मेरा घर खाक होने का डर है।

तीसरे शेर के लिए आपकी सलाह उचित है आदरणीय।

मक़्ते को आपने काफ़ी खूबसूरत बना दिया है। फिर भी उसके बारे में मैं अगर अपने तरीके से ये कहूँ तो कितना उचित होगा, कृपया मार्गदर्शन कीजियेगा।

"लहलहाने को है फ़स्ल अश्क़ों की "जय"
ये क़रिश्मा रेत पर होने को है"
या
"मोजिज़ा यह रेत पर होने को है"

सादर।।
Comment by जयनित कुमार मेहता on January 23, 2017 at 3:32pm
आदरणीय आरिफ़ जी, सुखननवाज़ी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।

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