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मौसम-ए-हिज्र ने इक फूल खिलाया है अभी (ग़ज़ल)

2122 1122 1122 22

सिवा उसके कोई मंज़र नहीं दिखता है अभी
गोया आँखों में वही नक़्श ही ठहरा है अभी

मौसम-ए-हिज्र ने इक फूल खिलाया है अभी।
बाद मुद्दत के उसे ख़्वाब में देखा है अभी

शब गुज़र भी चुकी महताब भी घर अपने चला
पर मेरी शम्अ-ए-उम्मीद को जलना है अभी

जानता हूँ कि कोई लहर मिटा ही देगी
आदतन नाम वो फिर रेत पे लिक्खा है अभी

मैं कलंदर हूँ, मुझे भूल से मुफ़लिस न समझ
कि मेरी जेब में ईमान का सिक्का है अभी

चाहते भी हैं कि बच्चा हो सयाना जल्दी
और हर बात पे कहते भी हैं, बच्चा है अभी

ऐ मेरी मौत, ज़रा रुक के तकाज़ा कर तू
मुझको तो ज़ीस्त का हर क़र्ज़ चुकाना है अभी

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by मिथिलेश वामनकर on February 6, 2017 at 6:19pm

आदरणीय जयनित जी, बढ़िया ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. सादर 

Comment by Mohammed Arif on February 5, 2017 at 6:53pm
आदरणीय जयनित कुमार जी आदाब, बहुत बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने दाद के साथ मुबारक़बाद पेश करता हूँ ।
Comment by Samar kabeer on February 4, 2017 at 7:23pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by जयनित कुमार मेहता on February 4, 2017 at 6:01pm

हार्दिक धन्यवाद आपको आदरणीय पंकज जी।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 4, 2017 at 12:56pm
बहुत बढ़िया जयनित भाई, बधाई

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