For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ये ,कैसा घर है ....

ये ,कैसा घर है ....
ये
कैसा घर है
जहां
सब
बेघर रहते हैं


दो वक्त की रोटी
उजालों की आस
हर दिन एक सा
और एक सी प्यास
चेहरे की लकीरों में
सदियों की थकन
ये बाशिंदे
अपनी आँखों में सदा
इक उदास
शहर लिए रहते हैं
ये
कैसा घर है
जहां सब
बेघर रहते हैं

उजालों की आस में
ज़िन्दगी
बीत जाती है
रेंगते रेंगते
फुटपाथ पे
साँसों से
मौत जीत जाती है
बेरहम सड़क है
भूख की तड़प है
हर मौसम एक सा है
न रात की चिंता है
न सहर का डर है
खुशियों के शानों पर
यहां अश्क ही बहते हैं
ये
कैसा घर है
जहां
सब
बेघर रहते हैं

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशसित

Views: 644

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Sushil Sarna on February 10, 2017 at 1:54pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी  जी रचना के भावों अपने स्नेह से अलंकृत करने का हार्दिक आभार। कुछ दिनों से अस्वस्थ होने के कारण आभार व्यक्त करने में विलम्ब हेतु क्षमा चाहूंगा। 

Comment by Sushil Sarna on February 10, 2017 at 1:54pm

आदरणीय विजय निकोर जी रचना के भावों अपने स्नेह से अलंकृत करने का हार्दिक आभार। कुछ दिनों से अस्वस्थ होने के कारण आभार व्यक्त करने में विलम्ब हेतु क्षमा चाहूंगा। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 3, 2017 at 10:04am

आदरणीय सुशील भाई , सताये हुओं की ज़िन्दगी पर अच्छी कविता कही है , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by vijay nikore on February 3, 2017 at 9:44am

 बहुत ही सुन्दर रचना लिखी है। आपको हार्दिक बधाई, भाई सुशील जी

Comment by Sushil Sarna on February 2, 2017 at 1:24pm

आदरणीय  laxman dhami जी प्रस्तुति पर आपके स्नेहिल शब्दों का हार्दिक आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2017 at 11:43am

ऑ० भाई सुशिल जी बेहतरीन यथार्थवादी रचना हुई है हार्दिक बधाई स्वीकारें .

Comment by Sushil Sarna on February 1, 2017 at 5:31pm

आदरणीय Mohammed Arif  जी प्रस्तुति पर आपके स्नेहिल शब्दों का हार्दिक आभार।

Comment by Mohammed Arif on February 1, 2017 at 5:04pm
आदरणीय सुशील सरनाजी, बेहतरीन रचना , बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on February 1, 2017 at 12:26pm


आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति को आपने जो आत्मीय मान दिया उसके लिए आपके तहे दिल से शुक्रिया। सर इंगित त्रुटि को मैंने संशोधित कर दिया है। इस हेतु आपका हार्दिक आभार।

Comment by Samar kabeer on January 31, 2017 at 10:23pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा और सच्ची कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
23वीं पंक्ति में 'रीत जाती है'को "बीत जाती है"कर लें,शायद टाइपिंग मिस्टेक है ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"हाड़-मॉंस स्ट्रेट (लघुकथा) : "नेता जी ये क्या हमें बदबूदार सॅंकरी गलियों वाली बस्ती के दौरे…"
17 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार आदरणीय मंच। इंतज़ार है साथियों की सार्थक रचनाओं का, सहभागिता का। हम भी हैं कोशिश में।"
17 hours ago
Admin posted a discussion

"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,सादर नमन।."ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।प्रस्तुत…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"इल्म गिरवी है अभी अपनी जहालत के लिए ढूँढ लो क़ौम नयी अब तो बग़ावत के लिए अब अगर नाक कटानी ही है हज़रत…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।"
Sunday
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"2122, 1122, 1122, 112/22 सर झुका देते हैं हम उसकी इबादत के लिए एक दिल चाहिए हमको तो मुहब्बत के…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सादर अभिवादन।"
Apr 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिएकर्बला   साथ   चले   कौन …"
Apr 25
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
" स्वागतम "
Apr 25
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 190 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा नौजवान शायर…See More
Apr 21
आशीष यादव posted a blog post

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत…See More
Apr 20
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, प्रस्तुत दोहों की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर"
Apr 19

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service