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बे-आवाज़ ....

कहां होती है
रिश्ते के
टूटने की
आवाज़
बस
सिसकता है
देर तक
रुखसारों की ढलानों पर
खारी लकीरों पर
सोया
सोज़ में डूबा
बीते लम्हों का
इक साज़
बे-आवाज़

सुशील सरना

मौलिक एवम अप्रकाशित 

Views: 740

Comment

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Comment by Sushil Sarna on February 23, 2017 at 5:29pm

आदरणीय   गिरिराज भंडारी  जी रचना के भावों को मान देने का हार्दिक आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 23, 2017 at 7:47am

आदरणीय सुशील भाई , बहुत सुन्दर कविता रची है , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Sushil Sarna on February 21, 2017 at 2:12pm

आदरणीय     narendrasinh chauhan जी रचना के भावों को मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by narendrasinh chauhan on February 20, 2017 at 6:25pm

लाजवाब 

Comment by Sushil Sarna on February 19, 2017 at 8:49pm

आदरणीय    Dr Ashutosh Mishra  जी रचना के भावों को मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on February 19, 2017 at 8:48pm

आदरणीय    Mohammed Arif  जी रचना के भावों को मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on February 19, 2017 at 8:48pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी बन्दे को इतना मान देने के लिए मैं आपका दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।  रचना के भावों को अपने स्नेह से पल्लवित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on February 19, 2017 at 8:46pm

आदरणीय   Mahendra Kumar जी रचना के भावों को मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 19, 2017 at 8:15pm
आदरणीय सुशील जी गागर में सागर जैसी इस शानदार रचना के लिए दहत सारी बधाई सादर
Comment by Mohammed Arif on February 19, 2017 at 5:10pm
आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, मन को भा गयी । बहुत ख़ूब!बधाई!बधाई!!

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