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ज़िक्र उनका, दुश्मनों की भीड़ बढ़ती ही रही---- पंकज द्वारा गजल

2122 2122 2122 212
ज़िक्र उनका, दुश्मनों की भीड़ बढ़ती ही रही
और मीरा पर नशे सी प्रीत चढ़ती ही रही

फैसला दुनिया का कुछ औ इश्क़ को मंजूर कुछ
कोई दीवानी मुरत अश्कों से गढ़ती ही रही

रास राधा संग कान्हा का हुआ ब्रज भूमि में
एक पगली मूर्ति की मुस्कान पढ़ती ही रही

तान मुरली पर मचल कर नृत्य करतीं गोपियाँ
इक दिवानी प्रिय को अपने हिय में मढ़ती ही रही


मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 14, 2017 at 7:53pm
आदरणीय अग्रज गिरिराज भंडारी जी सुझाव के लिए बहुत-बहुत आभार जल्दी ही इसमें एक और शेर जोडूँगा
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 14, 2017 at 7:52pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी सर सादर आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 3, 2017 at 8:18pm

आदरणीय पंकज भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ । आदरणीय अगर बात सही सूझे तो काफिया का दुहराव कर लेने मे कोई बुराई नही है , बड़े बड़े शायर भी कभी कभी ऐसा कर लिया करते हैं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2017 at 12:32pm

बहुत खूब ... हार्दिक बधाई .

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 2, 2017 at 9:29am
आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम, ये पहली बार हुआ है, 4 शैर ही हुए हैं। आगे फिर से 5 शेर ही रहेंगे

यहाँ काफ़िया कम पड़ गया
Comment by Samar kabeer on February 1, 2017 at 6:02pm
अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
कम से कम पांच शैर तो होना ही चाहिये ग़ज़ल में ?

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