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ग़ज़ल -है बोलने का मुझे इख़्तियार, कह दूँ क्या - ( गिरिराज )

1212   1122   1212    22 /122

सुनें वो गर नहीं,तो बार बार कह दूँ क्या

है बोलने का मुझे इख़्तियार, कह दूँ क्या

 

शज़र उदास है , पत्ते हैं ज़र्द रू , सूखे

निजाम ए बाग़ है पूछे , बहार कह दूँ क्या

 

कहाँ तलाश करूँ रूह के मरासिम मैं

लिपट रहे हैं महज़ जिस्म, प्यार कह दूँ क्या

 

यूँ तो मैं जीत गया मामला अदालत में

शिकश्ता घर मुझे पूछे है, हार कह दूँ क्या

 

यूँ मुश्तहर तो हुआ पैरहन ज़माने में

हुआ है ज़िस्म का भी इश्तिहार, कह दूँ क्या

 

हाँ, लहज़ा तल्ख़ था लेकिन कही हक़ीकत थी

ज़रा सा पूछ तो लेते, कि ख़ार कह दूँ क्या

 

वो, एक लम्हा भी जिसने मुझे हँसाया है

ये दिल कहे, उसे परवर दिगार कह दूँ क्या

 

*****************************************

 मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

Views: 963

Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 28, 2017 at 9:04am

आ. शिज्जु भाई , आभार आपका ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 27, 2017 at 6:58pm
वाह आदरणीय वाह बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई..सादर
Comment by KP Anmol on February 27, 2017 at 1:09pm

क्या कहने!

कहाँ तलाश करूँ रूह के मरासिम मैं

लिपट रहे हैं सिर्फ़ जिस्म, प्यार कह दूँ क्या

इस शेर पर ख़ास दाद

Comment by Chhaya Shukla on February 27, 2017 at 12:58pm

आदरनीय गिरिराज भंडारी जी पढ़ते ही वाह निकल आई | हार्दिक बधाई स्वीकारें |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 27, 2017 at 11:19am

बेहतरीन ग़ज़ल हुई है आ. गिरिराज भंडारी जी बहुत बहुत बधाई

कृपया ध्यान दे...

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