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गजल(पूछते लोग सब.....)

212 212 212 212
 लोग सब पूछते,  हम कहाँ जा रहे
आ गये दिन भले या अभी आ रहे।2

कौन क्या कह गया याद अब है कहाँ
रेवड़ी देखकर खूब ललचा रहे।2

कुल जमा देखिये बादलों की कला
हर बरस बूँद में खार बरसा रहे।3

रात के हाथ से बुझ गयीं बत्तियाँ
बोलते भी जरा कौन दिन ला रहे।4

जोर से पीटते ढ़ोर सब ढ़ोल हैं
कोकिला चुप हुई काग बस गा रहे।5
मौलिक व अप्रकाशित@

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on March 9, 2017 at 9:57am
आदरणीय गिरिराज भाई ,बहुत बहुत आभार आपका;आपकी सलाह शिरोधार्य है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 9, 2017 at 9:38am

आदरनीय मनन भाई , अच्छी गज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें । कुछ सलाह यूँ ही दे रहा हूँ सही लगे तो स्वीकार करें ....

लोग सब पूछते,  हम कहाँ जा रहे  --   हैं सभी पूछते हम कहाँ जा रहे
आ गये दिन भले या अभी आ रहे। - 

कौन क्या कह गया याद अब है कहाँ     --  कौन क्या कह गया याद वो क्यूँ करे
रेवड़ी देखकर खूब ललचा रहे।                रेवड़ी देख जो आज ललचा रहे     

Comment by Manan Kumar singh on March 8, 2017 at 9:54pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय महेंद्र कुमार जी,सादर।
Comment by Mahendra Kumar on March 8, 2017 at 9:23pm
बहुत बढ़िया ग़ज़ल है आदरणीय मनन जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।
Comment by Manan Kumar singh on March 8, 2017 at 8:06pm
शेर 4 की उला:

रात के हाथ से बुझ गईं बत्तियाँ
Comment by Manan Kumar singh on March 8, 2017 at 8:05pm
शेर 4 की उला:

रात के हाथ से बुझ गईं बत्तियाँ
Comment by Manan Kumar singh on March 8, 2017 at 7:59pm
आदरणीय समर साहिब आदाब एवं शुक्रिया आपका।आपने इंगित कराया,अब शेर लय में आ जायेगा,सादर।
Comment by Manan Kumar singh on March 8, 2017 at 7:57pm
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी,आपके प्रेरणा पूर्ण कथन से उत्साहित हूँ;आभार आपका।
Comment by Samar kabeer on March 8, 2017 at 5:51pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
4थे शैर का ऊला मिसरा लय में नहीं है,देखियेगा ।
Comment by नाथ सोनांचली on March 8, 2017 at 4:49pm
आदरणीय मनन कुमार जी अदब, कटाक्ष। व्यंग से लबरेज इस गजल पर मेरी अनन्त शुभकामनायेंप्रेषित हैं

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