For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल (चढ़ी है एक धुन मन में पढ़ेंगे जो भी हो जाए)

1222 1222 1222 1222

चढ़ी है एक धुन मन में पढ़ेंगे जो भी हो जाए,
बड़े अब इस जहाँ में हम बनेंगे जो भी हो जाए।

कोई कमजोर ना समझे नहीं हम कम किसी से हैं,
सफलता की बुलन्दी पे चढ़ेंगे जो भी हो जाए।

हमारे दरमियाँ जो भेद कुदरत का बड़ा गहरा,
बराबर उसको करने में लगेंगे जो भी हो जाए।

बहुत देखा हिक़ारत से न देखो और अब आगे,
नहीं हक जो मिला लेके रहेंगे जो भी हो जाए।

जमीं हो आसमां चाहे समंदर हो या पर्वत हो,
मिला कदमों को तुम से हम चलेंगे जो भी हो जाए।

भरेंगे फौज को हम भी चलेंगे संग सैना के,
वतन के वास्ते हम भी लड़ेंगे जो भी हो जाए।

हिमालय से इरादे हैं अडिग विश्वास वालीं हम,
'नमन' हम पूर्ण मन्सूबे करेंगे जो भी हो जाए।


मौलिक व अप्रकाशित

Views: 683

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by रामबली गुप्ता on March 15, 2017 at 6:14am
बहुत ही सुंदर आदरणीय भाई वासुदेव शरण जी। हर शेर मन को प्रभावित करता है। बेहतरीन भावों से सजी इस ग़ज़ल के लिये। बधाई स्वीकारें।सादर
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 10, 2017 at 8:29am
आदरणीय समर साहिब बहुत शुक्रिया।

बहुत देखा हिक़ारत से नहीं अब और गुंजाइश,
Comment by Samar kabeer on March 9, 2017 at 9:03pm
आपकी मुहब्बतों का शुक्रिया ।
'हिक़ारत से सकोगे ना कभी तुम देखने आगे'
इस मिसरे पर आप मेरा इशारा शायद समझ नहीं सके,मेरे कहने का अर्थ ये है कि इसमें व्याकरण दोष है,आप जो भाव पेश करना चाहते हैं वो स्पष्ट नहीं हो सके,सानी मिसरे के हिसाब से ऊला मिसरे में धमकी होना चाहिये जो नहीं है,मेरे ख़याल से ऊला मिसरा यूँ होना चाहिये :-
"हिक़ारत से न देखो तुम हमें बस याद ये रखना
नहीं हक़ जो मिला लेके रहेंगे,जो भी हो जाए"
वैसे आपके विकल्प सुरक्षित हैं,ये मात्र सुझाव है,उम्मीद है मेरी बात आप समझ लेंगे ।
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 9, 2017 at 5:51pm
आदरणीय गिरिराज जी बहुत आभार। ग़ज़ल में समर साहिब और आपने जो कमियाँ बताई उनका सुधार करने का प्रयास किया है। यह ग़ज़ल सुधार के बाद प्रेषित की गई है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 9, 2017 at 11:30am

आदरनीय वासुदेव भाई , अच्छी गज़ल कही है , बधाइयाँ स्वीकार करें । आदरनीय समर भाई जी की बातों का ख्याल कीजियेगा ।  एक बात और --

मिला कन्धा तुम्हारे संग डटेंगे जो भी हो जाए -- ये मिसरा भी आपका बे बहर है -- आपने , संग  को 2 मात्रिक माना है जबकि इसे 21 में बान्धना चाहिये था --  अनुस्वार वाले व्यंजन को 2 लिया जाता है -- जैसे रंग - रं = 2, ग =1 ।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 8, 2017 at 7:00pm
आदरणीय समर साहिब सर्वप्रथम तो आपके अच्छे स्वास्थ्य की बधाई और शुभकामना।
हिकारत से सकोगे ना कभी तुम देख अब आगे,
नहीं हक जो मिला लेके रहेंगे जो भी हो जाए।
मेरा भाव यहाँ था कि नारियाँ पुरुष समाज से कह रही हैं कि अब और हमें उपेक्षा से तुम नहीं देख सकते और जिस हक़ की हम अधिकारिणी थी वह हक़ लेके रहेंगी।
जमीं हो आसमाँ चाहे
वहाँ वाली ही है क्योंकि ग़ज़ल में नारि जाती अपना जज्बा प्रगट कर रही है। परन्तु वालीं ज्यादा ठीक रहेगा। आपकी टिप्पणी के बाद इस ओर ध्यान गया है।
Comment by नाथ सोनांचली on March 8, 2017 at 4:21pm
आदरणीय बासुदेव शरण अग्रवाल जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल पर आपकी बेहतरीन प्रयास, शेष उस्ताद समर साहिब ने कह ही डाला है। मेरी शैर दर शैर आपको दाद और मुबारकबाद पेश हैं।सादर
Comment by Samar kabeer on March 8, 2017 at 4:02pm
जनाब बासुदेव अग्रवाल'नमन'जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'हिक़ारत से सकोगे ना कभी तुम देख अब आगे'
इस पँक्त का अर्थ नहीं समझ सका,दूसरी बात 'तुम'शब्द के साथ 'देख'शब्द दोषपूर्ण है, और सानी से इसका रब्त भी नहीं है,देखियेगा ।

'ज़मीं हो आसमाँ फिर हो समंदर हो या पर्वत हो'
इस मिसरे में 'फिर'शब्द भर्ती का है, ये मिसरा यूँ कह सकते हैं:-
"ज़मीं हो आसमाँ हो या समंदर हो कि पर्वत हो"
मक़्ते के ऊला मिसरे में 'वाली'या 'वाले'?
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 8, 2017 at 2:19pm
आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी आपने ग़ज़ल में गहराई से शिरकत कर हौसला आफजाई की आपका बहुत आभार।
आदरणीय बह्र के विषय में भी इशारा देते तो मैं सुधार की कोशिस करता।
Comment by Mohammed Arif on March 8, 2017 at 12:37pm
आदरणीय वासुदेव अग्रवाल जी आदाब,बहुत बेहतरीन ग़ज़ल कही आफने । हर शे'र लाजबवब है । शे'र दर शे'र के साथ मुबारकबाद पेश कृता हूँ । बाक़ी बह्र के संदर्भ में विद्वजजन अपनी राय देंगे ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
28 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
54 minutes ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।संबंधों को निभा रहे, जैसे हो दस्तूर…See More
15 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
yesterday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आजकल खूब हो रहा है ये चलन और कभी कभी विवाद भी। आपकी चिरपरिचित शैली में विचारोत्तेजक लघुकथा। बधाई…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service