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(1)

 

(भ्रूण हत्या)

 

जैसे बेटा पैदा होना, इक वरदान कहा,

घर में न बेटी होना, एक बड़ा श्राप है !

 

होती न जो बेटियां तो, होते कैसे बेटे भला

इन्ही की वजह से तो, शिवा है - प्रताप है !

 

पैदा ही न होने देना, कोख में ही मार देना,

हर मज़हब में ये, घोर महापाप है !

 

महामृत्युंजय सम, वंश के लिए जो बेटा,

उसी तरह कन्या भी, गायत्री का जाप है !

---------------------------------------------------------------

(2)

(टीस)

 

राष्ट्र अपने के लिए, नशा कोढ़ के समान ,

जिसने उजाड़ दिए, लाखों नौजवान हैं !

 

नशे के गुलाम हुए, भूले इस बात को वो,

उनकी जवानी से ही, भारती की शान हैं !

 

भूल निज वंश करें, दानवों सी हरकतें

उन्हें बतलाए वे तो, ऋषि की संतान है !

 

देना होगा हौसला भी, इन्हें समझाना होगा,

हिम्मत करो तो सभी, मंजिलें आसान है

--------------------------------------------------

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Comment

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Comment by Rash Bihari Ravi on June 2, 2011 at 1:47pm
फटाफट लिखाकर उसपर न ध्यान देना ,
गुरु का ये काम अक्सर करता उदास हैं ,
आपने देखा गुना फिर उसपे ध्यान दी ,
पढ़ के लोग कह बैठे वाह क्या बात हैं ,
आप के साथ से मुझे यैसे लगने लगा ,
पत्थर को मिल गई पारस का साथ हैं ,
अब मैं लिखुगा लिख कर दोहराऊंगा ,
यैसा ही करने को सोचे हम आज हैं ,
Comment by Rash Bihari Ravi on June 2, 2011 at 1:35pm
आप की बातो से मुझे यैसे लगने लगा ,
पत्थर को मिल गई पारस का साथ हैं ,
सर सभी एक से बढ़ कर एक मजा आ गया

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 31, 2011 at 4:58pm
आदरणीय राजेंद्र स्वर्णकार जी,
सादर प्रणाम !

मैं शब्दहीन सा हो गया हूँ आपके इस अपार स्नेह के सामने ! और कुछ न कहता हुआ यह घनाक्षरी छंद आपको समर्पित है: 

आपकी फराखदिली, देख सदा ऐसे लगे 
आपका ये दिल जैसे, अपना पंजाब है !

आपने जो हाथ रखा, खादिम की पीठ पर,
मेरी जिंदगानी का ये, दिलकश बाब है ! 

आपकी कलम द्वारा, किया गया ज़िक्र मेरा,  
मुझे अब तक लगे, जैसे कोई खाब है !

पढ़ा
ख़त आपका तो, मुझे पता चला तब ,
ज़र्रे को बनाया जाता, कैसे आफताब है !

सादर !
योगराज प्रभाकर
Comment by धर्मेन्द्र शर्मा on May 31, 2011 at 4:11pm
आपके घनाक्षरी छंद के घन से हमारा दिल आल्हादित हो उठा. विषय का चयन और सटीक बातें, ये आसान काम नहीं है इस विधा में लिखने वालों के लिए. मेरे जैसे व्यक्ति, जिसे विधा की समझ भी नहीं है, उसके द्वारा आपकी रचना और विधा पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करना एक बचकाना हरकत ही होगी. 

महामृत्युंजय सम, वंश के लिए जो बेटा,

उसी तरह कन्या भी, गायत्री का जाप है !

 

ये पंक्तियाँ तो सब कुछ ही कह देती हैं. समझने वाले के लिए इससे ज्यादा और भला कहा भी क्या जा सकता है. पुन: बधाई स्वीकार करें.

 

आपका,
धर्मेन्द्र
Comment by Rajendra Swarnkar on May 31, 2011 at 3:43pm
आदरणीय योगराज प्रभाकर जी
नमस्कार !

सबसे पहली बधाई मेरी होने का संजोग नहीं था …
रात को आपको लिखने बैठा कि कम्प्यूटर में कोई तकनीकी गड़बड़ आ गई :(
मेरे छोटे बेटे ने सवेरे से कोशिशें की तो अब जा'कर लिखने की स्थिति संभव हुई है ।

तो स्वीकार करें आपके सुंदर कवित्तों के लिए हार्दिक बधाई !
…और साथ ही मेरा यह कवित्त आपके नाम …

एक योगराज और साथ में प्रभाकर हैं ,
आपकी हे गुणीश्रेष्ठ ! वाकई क्या बात है !
छंद के महारथी ! उस्ताद शाइरी के ! गुरू !
आपमें बताएं और क्या - क्या करामात है ?
आपके गुणों का क्या बखान करे कोई … अजी
अरे अरे ! किसकी मजाल है ? औक़ात है ?
और गुणियों का नाम मिले जहां डाल - डाल ,
आपका 'राजेन्द्र' वहीं नाम पात - पात है !

सादर
राजेन्द्र स्वर्णकार

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 31, 2011 at 10:32am
भाई गणेश बागी जी, आप सच माने बहुत साल बाद दोबारा घनाक्षरी कहने में बहुत ही आनंद आया ! उस से भी ज्यादा आनंददायक रहा सभी मित्रों का इस सनातम छंद के प्रति स्नेह और सम्मान ! आपने मेरी इस अदना सी कोशिश को सराहा - मेरा श्रम सार्थक हो गया !  आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 31, 2011 at 10:18am
आदरणीय आचार्य संजीव कुमार त्यागी जी - इस उत्साहवर्धन के लिए ह्रदय से आपका आभारी हूँ ! कृपया स्नेह यूँ ही बनाए रखें !

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 31, 2011 at 10:17am
आदरणीय आर के पाण्डेय जी, आपने मेरे प्रयास को सराहा - मेरा उत्साह दोगुना हो गया ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 31, 2011 at 10:15am
सूर्यजीत जी, भ्रूण हत्या आउर नशा - इ दुनो मुद्दा आपन देश खातिर बहुत ही महत्वपूर्ण बाटे, एही से इ विषय पर कलम चलावे के कोशिश कईनी हा ! रौआ के हमार कोशिश पसंद आईल एह खातिर रौआ के बहुत बहुत धन्यवाद !

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 31, 2011 at 10:15am
शेषधर भाई जी, महान तो आप और आपकी फराख-दिली है जो इस हकीर को इतना मान बख्शा है ! ये खादिम तो भाईयों के चरणों का दास है !

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