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गजल(पा लिया , खोया किसीने.....)

2122  2122  2122 212 

पा लिया, खोया किसीने,चल रहा यह सिलसिला
ख्वाहिशें अनजान थीं जो कुछ मिला अच्छा मिला।1

गर्दिशों के दौर में अरमान मचले कम नहीं
पर सरे पतझड़ यहाँ उम्मीद का अँखुआ खिला।2

घाव देकर हँस रहे हैं आजकल बेख़ौफ़ वे
कौन अपनों से करेगा बोलिये फिर से गिला?3

डर गये जीते शज़र सब आँधियों के जोर से
सूखता-सा जो खड़ा है कब सका कोई हिला?4

ले घड़ा छोटा बहुत सब माँगते फिरते समद
माँगते उतना कि प्यासे होंठ को देते पिला।5

बुद्धिमानों का यहाँ <जमघट लगा हर मोड़ पर /span>
बिलबिलाता आदमी कब से कहो कुछ भी मिला?6

झूठ का धंधा चला है सच हुआ कुर्बा बहुत
थक गया है आदमी यूँ ढूँढ़ता अपना सिला।7

बेचता ईमां मुसाफिर साँस लेने के लिये।
भाव है उस जिंस का जिसमें रहे कुछ भी मिला।8

वीरताओं की कथाएँ केंचुए गढ़ने लगे
रीढ़ लज्जित है अभी लगता 'मनन' भी पिलपिला।9
'मौलिक व अप्रकाशित'@ 

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Comment by Manan Kumar singh on April 15, 2017 at 12:34pm
बहुत बहुत आ भा री हूँ आ दर णी य गिरि राज भा ई।
Comment by Manan Kumar singh on April 15, 2017 at 12:33pm
बहुत बहुत आ भा र आदरणीया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 12, 2017 at 8:55pm

आदरणीय मनन भाई , गज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है ... हार्दिक बधाइयाँ । गुणि जनो मे सही सलाहें दीं है ... खयाल कीजियेगा और प्रयास कीजियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 12, 2017 at 11:13am

आद० मनन जी ग़ज़ल पर लगता है आपने मेहनत  भी खूब की किन्तु बात नहीं बनी जैसा नीलेश भैया ने कहा है वाक्य विन्यास सही नहीं है मिसरों में 

जैसे इस मिसरे को ही लो --माँगता उतना कि सकता होंठ को पानी पिला।5----ये कैसा वाक्य हुआ आदरणीय 

क्या व्याकरण इसे स्वीकारेगा ? इसी तरह अन्य मिसरे भी देखिये 

भाव बहुत अच्छे हैं कुछ शब्दों के हेर फेर से ग़ज़ल दुरुस्त हो सकती है मुझे विशवास है आप कर  लेंगे 

Comment by Manan Kumar singh on April 11, 2017 at 10:23pm
आदरणीय, पुनश्च वाक्य-विन्यास वगैरह पर गौर करना पड़ेगा शायद।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 11, 2017 at 9:32pm

आ. मनन जी 
मिसरों को स्वतंत्र वाक्य मान कर पढ़ें कि क्या वाक्य ऐसे लिखे जाते हैं या शब्द संयोजन अलग हो सकता है ... ऐसा करने से ग़ज़लियत बढ़ेगी ... सिर्फ़ मात्रा क्रम ही न गिनें ..शब्दविन्यास भी देखें 
सदर  

Comment by Manan Kumar singh on April 11, 2017 at 9:15pm
आदरणीय नीलेश जी,नजरे-इनायत करने के लिए शुक्रगुजार हूँ।गर कुछ इंगित करते तो मैं भी आपकी बात समझ पाता,गौर करता।
Comment by Manan Kumar singh on April 11, 2017 at 9:14pm
आभार आदरणीय बैजनाथ जी।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 11, 2017 at 8:05pm

बहुत उलझा हुआ कहन है ...
शेर कहने की तरकीब भी सही नहीं है ..
चिंतन कीजयेगा 
सादर 

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on April 11, 2017 at 7:54pm

आदरणीय मनन साहेब......बहुत खूब ......हार्दिक बधाई स्वीकार करें 

कृपया ध्यान दे...

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