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ग़ज़ल नूर की - ज़रा सी देर में सूरज निकलने वाला

१२१२/ ११२२/ १२१२/ २२

अँधेरों!! “नूर” ने जुगनू अभी उछाला है,
ज़रा सी देर में सूरज निकलने वाला है.
.
बिदा करेंगे तो हम ज़ार ज़ार रोयेंगे,
तुम्हारे दर्द को अपना बना के पाला है. 
.
नज़र भी हाय उन्हीं से लड़ी है महफ़िल में,
कि जिन के नाम का मेरे लबों पे ताला है.  
.
शजर घनेरे हैं तख़लीक़ में मुसव्विर की
सफ़र की धूप ने उस पर असर ये डाला है.  
.
निकल के कूचा-ए-जनां से आबरू न गयी,
लुटे हैं सुन के हमें दिल से भी निकाला है. 
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1033

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 8:09am

शुक्रिया आ. महेंद्र जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 8:09am

धन्यवाद आ. गुरप्रीत सिंह  जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 8:09am

धन्यवाद आ. डॉ आशुतोष जी 

Comment by Mahendra Kumar on May 4, 2017 at 8:06pm

बिदा करेंगे तो हम ज़ार ज़ार रोयेंगे, तुम्हारे दर्द को अपना बना के पाला है... वाह! क्या शेर कहा है आपने। बहुत पसंद आया। इस उम्दा ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आ० निलेश जी। सादर।  

Comment by Gurpreet Singh jammu on May 4, 2017 at 10:27am

आदरणीय नीलेश सर जी बहुत ही शानदार और जानदार ग़ज़ल कही है आपने,,,सभी अशआर दिल को छू लेने वाले
बिदा करेंगे तो हम ज़ार ज़ार रोयेंगे,
तुम्हारे दर्द को अपना बना के पाला है.

वाह वाह बहुत ही खूब

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 3, 2017 at 5:28pm

आदरणीय नूर जी बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हमेशा की तरह ..हर शेर शानदार है मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 3, 2017 at 3:42pm

शुक्रिया आ. रवि जी 

Comment by Ravi Shukla on May 3, 2017 at 11:40am

आदरणीय नीलेश जी बेहतरीन मतले से शुरू गजल ने अंत तक समा बनाए रखा बधाई स्‍वीकार करें

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 2, 2017 at 6:49pm

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Samar kabeer on May 2, 2017 at 6:07pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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