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दमकते फिर रहे हैं झुग्गियों में (ग़ज़ल) - ज़हीर क़ुरेशी

1222-1222-122

 

वो ये भी कह रही है सिसकियों में,

बहुत जल बह चुका है नद्दियों में !

 

युवा फूलों पे मँडराने को लेकर,

मची है होड़ क्वाँरी तितलियों में.

 

धुँए को चीरकर घुसने लगी है,

चिता की आग गीली लकड़ियों में.

 

नदी के साथ मीठी मछलियाँ भी,

पहुँच जाती हैं खारी मछलियों में !

 

कई महलों में रहने योग्य हीरे,

दमकते फिर रहे हैं झुग्गियों में.

 

ये ‘एस.एम.एस.’ करने वाली पीढ़ी,

लिखे विस्तार से क्या चिट्ठियों में ?

 

बहुत-से लोग सूरज की चमक को,

छिपाना चाहते हैं बदलियों में !

 

ज़हीर क़ुरेशी

 

(मौलिक व अप्रकाशित) 

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Comment

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Comment by Mahendra Kumar on May 17, 2017 at 9:27am

बहुत बढ़िया ग़ज़ल है आदरणीय ज़हीर क़ुरेशी जी. हार्दिक बधाई प्रेषित है. सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 16, 2017 at 9:14pm

आदरणीय बृजेश भाई ,  मेरे ख्याल से नद्दियों उन  हिन्दी के शब्दों मे से एक है जिन्हे उर्दू दाँ अपनी सहुलियत के लिये स्वीकार कर लिये हैं ... असली और सही नदी ही है , वैसे अब आप भी नद्दी  कह सकते हैं , ज़रूरत पड़ने पर ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 15, 2017 at 8:42pm
आदरणीय जहीर भाई सूंदर प्रस्तुति के लिए हरदुक बधाई स्वीकार करें सादर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on May 15, 2017 at 6:02pm
आदरणीय जहीर जी हारदिक बधाई स्वीकारें इस ग़ज़ल के लिए!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 15, 2017 at 10:43am

आदरणीय ज़हीर भाई , खूबसूरत गज़ल कही है , बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 14, 2017 at 8:12pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीय..सिर्फ उत्सुतावश पूँछ रहा हूँ क्या नद्दियों शब्द उचित है..हालाँकि ग्रामीण अंचलों में नद्दी शब्द प्रचलन में देखा है..विशेषकर यू पी के बुंदेलखंड इलाके में..
Comment by नाथ सोनांचली on May 14, 2017 at 12:02pm
आद0 ज़हीर क़ुरेशी साहब आदाब, बेहद उम्दा ग़ज़ल। शैर दर शैर दाद और मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर

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